सोमवार, 22 दिसंबर 2014

स्मृति शेष श्री हरिकृष्ण तैलंग

स्मृति शेष श्री हरिकृष्ण तैलंग

शब्द शिल्पी का हिंदी दिवस पर देह दान


// ताउम्र हिंदी की सेवा करनेवाले 80 वर्षीय वरिष्ठ रचनाकार श्री हरिकृष्ण तैलंग के 14 सितंबर 2014 को देहावसान पश्चात उनकी अंतिम इच्छानुसार मेडिकल स्टडी और रिसर्च हेतु कोलार रोड, भोपाल स्थित "एलएन मेडिकल काॅलेज एंड रिसर्च सेंटर" में उनकी देह समर्पित कर दी गयी। प्रख्यात डाॅक्टर  डीके सत्पथी देहदाताओं को "आधुनिक दधीची" मानते हैं जिनका मृत शरीर राक्षस रुपी अनगिनत रोगों से लड़ने में अध्धयनरत चिकित्सकों की मदद करेगा।// 
  
‘श्री हरिकृष्ण तैलंग की व्यंग्य रचनाएँ जीवन में व्याप्त छद्म को पकड़ती हैं। उन्होंने बड़ी बारीकी से अपने आसपास की जिंदगी को देखा और समझा है, उसके अंदर मौजूद व्यंग्य को बाहर लाने की सफल कोशिश की है। अपनी रचनाओं में श्री तैलंग ने आज के पाखंड और मानवीय संवेदना के प्रति तथाकथित संभ्रांतता की पोल अच्छी तरह खोली है। वर्तमान, स्नाब सभ्यता को बेनकाब किया है।’ उक्त मान्यता सुपरिचित समीक्षक और शिक्षाविद् रमेश दवे की है। 27 दिसंबर 1934 को राजा बिलहरा (सागर) में जन्मे श्री तैलंग ने रचनात्मक और यशस्वी जीवन जिया और मरणोपरांत मानव शरीर की संरचना और उसकी क्रियात्मक प्रक्रिया समझने हेतु निर्जीव देह को चिकित्सकीय अध्ययन हेतु अर्पित कर उत्कृष्ट प्रेरणा का अनुकरणीय सृजन कर दिया। उल्लेखनीय कि हिंदी की दीर्घ सेवा करनेवाले इस अनूठे रचनाकार ने अपने जीवन की आखिरी सांस भी हिंदी दिवस (14 सितंबर) को ही ली जिसे राष्ट्रभाषा हिंदी का हर साहित्यकार और प्रेमी सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानता है। 
उन्होंने व्यंग्य पुस्तक "घासचोरी का मुक़दमा" में लिखा, ‘मेरा सरोकार सिर्फ विपक्ष में खड़ा होना है, पक्ष के और विपक्ष के भी। और विपक्ष के भी किसी विपक्ष में, जो बहुतों का पक्ष हो सकता है, पर एक विवेकसंगत तार्किकता और सच होने की अनुभूति के साथ।’ वे चर्चा में अक्सर कहते थे कि सारा संसार दो पक्षों में ही विभक्त नहीं है। संसार भर के लोगों का भाग्य बारह राशियों में नहीं आँका जा सकता। अगर ऐसा ही होता तो अँधेरे में जागता संयमी या विवेकशील क्या कुछ देख पाता ? कबीर भी छाती ठोककर यह नहीं कहते -दोनों ने ही राह नहीं पाई, और, संसार खाने और सोने में मगन है, सिर्फ कबीर ही जागता तथा रोता है।’ 
लेखन का आरंभ यूँ श्री तैलंग ने बाल साहित्य से किया और तब की सर्वश्रेष्ट, बहुपठित बाल पत्रिकाओं -‘पराग’, ‘बालसखा’, ‘नंदन’, ‘बालभारती’ आदि में प्रमुखता से प्रकाशित होकर प्रथम पंक्ति के शीर्षस्थ बाल रचनाकारों में अपनी अमिट छाप गढ़ी, जो अंत तक उनके कृतित्व पर चस्पा रही। नई पीढ़ी के उत्तम चरित्र निर्माण और चहुँमुखी उत्थान में बतौर श्रेष्टतम बाल साहित्यकार उनके साहित्य का अमूल्य योगदान है। बाल मनोविज्ञान के अदभुत, सक्षम और संस्कारशील लेखन के लिए वे प्रतिष्ठित रहे। ‘कुत्तापालक कालोनी’ और ‘घास चोरी का मुकदमा’ शीर्षक व्यंग्य संग्रहों ने उन्हें अग्रणीय व्यंग्यकारों में स्थापित किया। ‘घास चोरी का मुकदमा’ को मप्र साहित्य अकादमी का प्रतिष्ठित "शरद जोशी सम्मान" और मप्र हिंदी साहित्य सम्मलेन का "वागीश्वरी सम्मान" भी प्राप्त हुआ। उनकी मारक और गुदगुदानेवाली व्यंग्य रचनाओं में समकालीन जीवन की विसंगत और विरोधाभासी विडंबनाओं के पैने, चुुटीले विश्लेषण को खूब सराहा। समीक्षक जो गुण लीक से हटकर मानते हैं, वह यह कि व्यंग्य के लिए उन्होंने कहानी, नाटक, उपन्यास, कविता जैसी किसी विधा को माध्यम न बनाकर उसको किस्सगोई या अति नरेटिविज्म से बचाया, इसीलिए उनका व्यंग्य सौ फीसदी खरा, खालिस, टंच व्यंग्य माना गया, दूसरी विधा नहीं। उनके अनुसार, सार्थक व्यंग्य रचना की भाषा रचनात्मक माध्यमों से तरह-तरह के तेवर प्रकट करती है। उन्होंने व्यंग्य को अंग्रेजी शब्द ‘सटायर’ का अनुवाद मात्र नहीं माना। न ही व्यंग्य की तुलना हास्य से करने के हिमायती थे। ‘आयरनी’ शब्द को भी वे व्यंग्य का समानार्थी अथवा पर्यायवाची नहीं मानते थे बल्कि उसे साहित्य की एक संपूर्ण रचनात्मक शैली कहते रहे। विद्वतजन मानते हैं कि आयरनी व्यंग्य से अधिक गंभीर अभिव्यक्ति है। पुरस्कृत व्यंग्य कृति में उन्होंने समर्पण के तहत् जो कटाक्ष -‘बेटियों को, जो औरत बनने के साथ-साथ समाज में व्याप्त बहुविध व्यंग्य की शिकार बने रहने को अभिशप्त रहती हैं’-  किया, वह उनकी संवेदनात्मक और गहरी चिंतन दृष्टि का परिचायक है। पहले व्यंग्य संग्रह "कुत्ता पालक कॉलोनी" में उन्होंने समर्पण में लिखा -‘उनको जो व्यंग्य उपजा रहे हैं’। श्री तैलंग कहा करते थे कि ‘व्यंग्य जिया ज्यादा जा रहा है। लिखा कम जा रहा है। समय की नियति ने सभी रसों में मिलावट कर रखी है। श्रृंगार, करुणा, वात्सल्य आदि की परिणिति अब व्यंग्य होती है। मिलावट समर्थ व्यंग्यकार को नजर आ रही है और वह कचोट खा-खा जाता है। वही कचोट वह रचना में उतार रहा है।’
उनकी राय थी कि ‘सारा समाज स्वर्ण में सारे गुण देख रहा है, जबकि व्यंग्यकार की तीसरी आँख स्वर्ण कलश में भरे जहर को पहचान रही है। सुखिया सब संसार है पर दुखिया अकेला व्यंग्यकार। जब सब खाने-पीने, मौज-मस्ती में दिन और सोने में रात गुजार रहे हैं, व्यंग्यकार जाग रहा है और अँधियारे की बढ़ती कालिमा पर रो रहा है। पर विडंबना यह है कि उसका रोना ‘शिष्ट हास्य’ कहा जा रहा है।’ वे पूरे भरोसे के साथ मानते थे कि ‘जब आजादी के बाद का इतिहास लिखा जायेगा तो इतिहासकार को व्यंग्य साहित्य प्रमाणिक सामग्री मुहैया करेगा। अन्य सामग्री तिथियाँ और नाम जुटाने के काम की भर रहेंगी। व्यंग्यकारों पर ऐसी संभावना का दायित्व है। व्यंग्य लेखन की यही सार्थकता मुझे लगती है, इसलिए विनय है कि व्यंग्यकार को पूरी ईमानदारी और दृढ़ता के साथ पैनी नजर रख कुशल कलम थामे रहना होगा।’     
वे कहते थे -"बढ़ते जा रहे पाखंड की विद्रूपताएँ, विसंगतियाँ सामाजिक आचरण की समरसता को हर जगह भंग, ध्वस्त कर रही हैं, एक सच्चा व्यंग्यकार अपनी पैनी नजर से उन्हीं को सामने रचता है। चूँकि हर वस्तु, घटना, आदमी का चरित्र, कार्यकलाप बहुआयामी हैं, जटिल हैं, उन बहुआयामों, जटिलताओं को परखकर रचनाकार तह तक जाकर असलियत को उभारता है, व्यक्ति, समाज, देश, पर्यावरण आदि की बेहतरी के लिए अपना पक्ष विवेचित करता है।   
श्री तैलंग की कुछ चर्चित पुस्तकें
देश के शीर्षस्थ व्यंग्यकारों में शुमार डाॅ. ज्ञान चतुर्वेदी के अनुसार ‘सामान्य से लगनेवाले, लगभग स्थानीय-से विषयों को व्यापक व्यंग्य का फलक देना, वह भी एकदम सीधी-सहज-सरल भाषा में, बगैर किसी चमत्कारिक शैलीगत प्रयोगों के मगर फिर भी अपने व्यंग्य में एक:बात’ पैदा करना श्री तैलंग की विशेषता रही है। वे आज की पीढ़ी के बहुत-से स्वनामधन्य व्यंग्यकारों को अच्छे व्यंग्य के दो-चार पाठ पढ़ा सकते हैं।’
श्री तैलंग का ‘वे लोग’ परिवार से जीवंत रिश्ता रहा है। बाल साहित्य, नवसाक्षर, प्रौढ़, व्यंग्य आदि विधाओं की उनकी प्रमुख पुस्तकें ‘पतंग बोली’, ‘होली का हौवा’, ‘जूता चर्चा’, ‘बात का बतंगड़’, ‘मेंढक की करामात’, ‘बोलती पुतलियाँ’, ‘वाहन कैसे बने कैसे चले’, ‘हमारा गाँव हमारा देश’, ‘फलों का राजा आम’, ‘प्याज और लहसुन’, ‘पर्यावरण और संतुलित भोजन’, ‘जल: जीवन और जहर’, संस्कृत कथाएँ’, ‘बुद्धचरितम्’ ‘अपंग जिनसे दुनिया दंग’, ‘बकरी के जिद्दी बच्चे’, ‘अच्छे दोस्त बनाओ’, ‘कथाओं में नाचता मोर’ आदि हैं। "नाम एक नगर अनेक" और "नाम एक व्यक्ति अनेक" उनकी प्रकाशनाधीन पुस्तकें हैं। एक लोकप्रिय और श्रेष्ठ शिक्षक के रूप में भी उनकी पहचान अमिट रही है। 

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

सिविल लाइनवाले हनुमानजी


व्यंग्य/हरिकृष्ण तैलंग
सिविल लाइनवाले हनुमानजी
//तुलसीदास को भगवान राम से हनुमानजी ने ही मिलवाया था। एकनिष्ठ रामभक्त को भी ‘मीडिएटर’ का सहारा लेना पड़ा था। शायद इस कलिकाल में भगवान का यही रवैया है या शायद हनुमान ने ही रामजी को सुझाया हो -'तुलसी आपका भक्त जरूर है, पर परम्परा विरोधी है। पीडि़त जनता की ओर है। आम आदमियों की भाषा बोलता है। जनकवि कुछ उल्टे-सुल्टे पश्न न पूछ बैठे ? आम आदमियों की पीड़ाएँ बताकर, आपको द्रवित कर, इस रावण राज्य के हनन का निमंत्रण न दे दे। आप ठहरे लोक रंजक। राजपाट छोड़-छाड़कर फिर अवतार न ले लें। एक ही रावण से युद्ध कर हम लोग तो थक चुके हैं। अब रामराज्य में मजे की वंशी बजा रहे हैं। दर्जनों रावणों से कौन लड़ेगा ? सो हे रामजी, बेचारे तुलसी से, जो रामराज्य के सपनों में खोया रहता है, मिल तो लो पर बोलना कुछ नहीं। बाकी हम समझ लेंगे। रामजी भी अपने निजी सेवक की बात मान गए। पुरानी परम्परा है, माननीयों से मिलना हो तो माध्यमों के माध्यम से मिल लो, पर पहले उन्हें संतुष्ट करके।'//
बहुत दिनों से बाहु पीड़ा से परेशान हूँ। वाम बाहु है जो पीड़ा दे रहा है। डाॅक्टर बदले, दवाएँ बदलीं पर दर्द में कोई खास हेर-फेर नहीं हुआ। दर्द से पूरा शरीर बेचैन रहता है। पहले शरीर अच्छा खाता-पीता था। चैन से सोता था, पर अब वामांग शरीर सुख के विरुद्ध हो गया है। पता नहीं कौन-सा और कितना भ्रष्टाचार हो गया मुझसे कि वामांग इस तरह विचल उठा है ?
पत्नी कहती है -‘वामांग शरीर का आधा हिस्सा है। वह शरीर सुख और पुष्टता के लिए बराबरी का साझीदार है। दिल भी उसी तरफ है जो पूरे शरीर में रक्त-प्रवाह बनाए रखता है। पर यदि सारे सुख दाएँ हाथ की हथेली पर ही रखे जाते रहें तो वामांग विद्रोह कर सकता है। पूरे शरीर को तकलीफ में डाल सकता है। तुम्हारे दाएँ बाहु ने कभी इस तरह सोचा ही नहीं। बस, मजे से सारी सुख-सुविधाएँ चुन-चुनकर उठाता रहा। मीठा-मीठा खाता-पीता रहा। इसी से तुम्हारा वाम बाहु चिढ़ गया है।’
पत्नी की बात गड़ती तो है, पर कोई उत्तर नहीं देता। इस कष्ट में वही सेवा कर रही है पर पैनी बातें भी कर देती है। मित्रों को पता चला तो उनका आना-जाना शुरु हुआ। हर एक अपने-अपने नुस्खों के साथ आया, पर एक दिन एक मित्र ने साफ कहा -’आपने बीसियों सूत्रों से प्राप्त उपचार कर डाले पर दर्द गया नहीं। वामांग का दर्द सूत्रों से संतुष्ट न होगा। उसके लिए संपूर्ण शक्ति लगाना पड़ेगी। एक ही रास्ता है तुम्हारे कष्ट निवारण का।’
‘कौन-सा ?’ मैं उत्सुकता से पूछ बैठा।
‘हनुमानजी की शरण गहो। इस कलिकाल में वही एकमात्र संकटमोचन हैं।’ मित्र ने पूरे आत्मविश्वास से कहा।
तभी पत्नी भी आकर मूढ़े पर बैठ गई। बोली -‘मैं तो कब से कह रही हूँ, पर सुनते कहाँ हैं ? मुझे दिन भर परेशान करते रहते हैं।’ उसके चेहरे पर शिकायत उभर आई थी।
‘तभी वामांग की पीड़ा सह रहे हैं। भाभीजी, सारे देश में जब आदमी निराश हो जाता है तो देवी-देवताओं की शरण में आ जाता है। पुरातन काल से यही भारतीय परंपरा है। नहीं तो इस देश में तैंतीस करोड़ देवताओं की कल्पना की जाती भला ?’ मित्र बोले।
‘हाँ भाई, अब तो निराशाएँ और बढ़ती जा रही हैं। तभी तो देवी-देवताओं की संख्या में भी इजाफा हो चुका है। संतोषी माता, भगवान रजनीश, सत्य साईं बाबा, प्रजापति ब्रह्मा आदि चालीस-पचास देवता और बढ़ गए हैं। आजादी के बाद इस क्षेत्र में परिवार नियोजन की कोई बंदिश नहीं लगी।’ मैंने मुस्कराकर कहा।
‘देखो जी, दूसरों के सामने ताने मत दिया करो। संतोषी माता का व्रत करती हूँ। तभी निभा रही हूँ।’ पत्नी को बुरी लगी मेरी बात।
‘भाभीजी, ठीक कहती हैं। नए देवी-देवताओं में प्रताप न होता तो उनके नए-नए मंदिर भव्य और भीड़ जोड़ने वाले होते क्या ? आप तो कुछ ले आइए खाने-पीने को, तब तक मैं इन्हें समझाता हूँ।’ मित्र ने कहा। पत्नी अपना पल्लू समेट कर अंदर चली गई।
‘आप जरूर भाभी को तंग करते रहते हैं। उसी की सजा है यह वामांग का दर्द। अगर ठीक करना चाहते हो तो हनुमानजी की शरण में जाओ। शनि और मंगल को दर्शन करो उनका’, मित्र बोले।
‘करूंगा दर्शन। पर किस हनुमान के पास जाऊँ ? मुहल्ले के ही या मरघटिया हनुमान के ?’ मैंने पूछा।
मित्र ने मुँह बिचकाया। बोले -‘इतने नए-नए हनुमान मंदिर बन गए हैं, पर तुम उन्हीं मरघटिया हनुमान से चिपके हो। वह तो काफी पुराने हैं। उनका प्रताप अब जाता रहा।‘
‘तो फिर’, मैंने पूछा।
वह बोले -‘सिविल लाइन वाले हनुमानजी का आजकल बड़ा प्रताप है। पैंतीस साल पहले एक बाबा ने उनकी स्थापना की थी। पहले की मढि़या अब आलीशान मंदिर बन चुकी है। जो भी, जैसी भी पीड़ा निवारण चाहता है अपनी अर्जी लगाता है और फल पाता है। हाँ, पीड़ा के अनुसार दर्शनों की संख्या और प्रसादी का सवाल है।’
‘दर्शन तो कई बार कर आऊंगा पर प्रसादी ? कच्ची चढ़ती है या पक्की ?’ मैंने मुस्कराकर पूछा।
‘कच्ची चढ़ती होगी तुम्हारे मरघटिया हनुमान के यहाँ। सिविल लाइन वाले को शुद्ध पक्की चाहिए। वह भी पउवा भर नहीं फुल एक किलो, नहीं तो पुजारी भगा देगा तुम्हें’, मित्र ने आत्मीय लहजे में बताया।
‘ठीक है। भुगतूंगा उसे भी। पीड़ा से मुक्ति तो मिले’, मैं कह रहा था कि श्रीमती प्याले खनखनाते आ गई। टेबल पर रखते हुए बोली -‘अभी तो मैं भुगत रही हूँ। मुक्ति तो मुझे मिलेगी’, और भीतर चली गई।
मित्र के जाने के बाद मैं सोचने लगा, मित्र ने बात तो पते की कही है। हनुमानजी तो पुराने जागृत देवता हैं। चिरजीवी हैं। इस कलिकाल में भी साक्षात् दर्शन देते हैं। तुलसीदास को भगवान राम से उन्होंने ही मिलवाया था। एकनिष्ठ रामभक्त को भी ‘मीडिएटर’ का सहारा लेना पड़ा था। राजा राम से कवि तुलसी की मुलाकात दो बार हुई थी। शायद इस कलिकाल में भगवान का यही रवैया है या शायद हनुमानजी ने ही रामजी को सुझाया हो -तुलसी आपका भक्त जरूर है, पर परम्परा विरोधी है। पीडि़त जनता की ओर है। आम आदमियों की भाषा बोलता है। जनकवि कुछ उल्टे-सुल्टे पश्न न पूछ बैठे ? आम आदमियों की पीड़ाएँ बताकर, आपको द्रवित कर, इस रावण राज्य के हनन का निमंत्रण न दे दे। आप ठहरे लोक रंजक। राजपाट छोड़-छाड़कर फिर अवतार न ले लें। एक ही रावण से युद्ध कर हम लोग तो थक चुके हैं। अब रामराज्य में मजे की वंशी बजा रहे हैं। दर्जनों रावणों से कौन लड़ेगा ? सो हे रामजी, बेचारे तुलसी से, जो भारत में रामराज्य के सपनों में खोया रहता है, मिल तो लो पर बोलना कुछ नहीं। बाकी हम समझ लेंगे। रामजी भी अपने निजी सेवक की बात मान गए। पुरानी परम्परा है, माननीयों से मिलना हो तो माध्यमों के माध्यम से मिल लो, पर पहले उन्हें संतुष्ट करके।
फिर याद आया, तुलसी को भी बाहु कष्ट हुआ था। बचपन से ही उन्होंने बहुत कष्ट सहे थे। जवानी कुछ सरस हुई थी कि वामांग विचल गया। सो उन्हें रघुनाथजी से प्रीत करनी पड़ी। उनके गुणगान का पट्टा लिख दिया उन्होंने। ‘रामचरित’ रचकर राम का यश जगत् व्यापी बना दिया। फिर भी उन्हें अपने कष्टों के लिए ‘थ्रू प्राॅपर चेनल’ कई अर्जियाँ देना पड़ी थीं। ‘विनय पत्रिका’ जैसा काव्य ग्रंथ ही बन गया उन अर्जियों से। रामराज्य में संतों को ही उचित मार्ग अपनाना पड़ता है।
बाद में, उन्हें दकियानूसी ब्राह्मणों ने पीड़ा पहुँचाई। उनकी खिल्लियाँ उड़ाकर उन्हें खूब खिजाया। फिर तुलसी को बाहु पीड़ा ने सताया था। मैं सोचता हूँ कि तुलसी का वाम बाहु ही पीड़ाग्रस्त हुआ था, क्योंकि उसी काल में उन्होंने पीड़ा मुक्ति के लिए ‘हनुमान बाहुक’ लिखा जो दाहिने हाथ से ही लिखा होगा। अगर दायें बाहु में पीड़ा होती तो ‘हनुमान बाहुक’ कैसे लिखा जाता ? (इस शोध के लिए मुझे डाॅक्टरेट मिलना चाहिए) 
मेरे शंकालु मन में तभी एक प्रश्न और उछला। बाहु कष्ट के लिए तुलसी ने राम बाहुक क्यों नहीं लिखा ? शंका समाधान भी मेरे मन ने किया, रामजी सर्वप्रभुत्व सम्पन्न थे। लोक कल्याण के बड़े-बड़े मसले थे उनके पास। दुनिया भर की चिंताएँ उनके सिर-माथे रहती हैं। भारत तो अपना राज्य है। गरीब और संत प्रकृति के संतोषी भक्तों के लिए उनके पास फुरसत कहाँ ? वह छोटा काम क्यों करें ? वह तो उद्धारक हैं। पूरे शरीर का ही उद्धार करते हैं। उन्होंने अहिल्या का उद्धार किया ही था जिसका पूरा शरीर शिला हो गया था। कठोर और रसहीन। राम ने अपने चरण कमल छुआकर उसे कोमलांगी, सुंदर, सरस नारी में बदल दिया था। अगर तुलसी के पूरे शरीर में लकवा मार जाता तो अर्जी पाने पर रामजी आगे आकर उनके पूरे शरीर का उद्धार कर देते। राम नाम सत्य हो जाता।
तुलसी को इतनी समझ थी। छोटे-से काम के लिए वह सर्वप्रभुत्व सम्पन्न प्रभु को क्यों परेशान करते ? जब पीए ही मामला निपटा सकता है तो माननीय को क्यों तकलीफ दी जाये ? शासन के गोरखधंधों से गुजरते हुए कवि तुलसी की यह अनुभव यात्रा थी कि ‘राम से बड़ो राम कर दासा’। सो तुलसी ने ‘हनुमान बाहुक’ लिखा। मैं तुलसी की अर्जी के कुछ वाक्य बुदबुदा उठा -‘को नहीं जानत है जग में, कपि संकटमोचन नाम तिहारो, बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जो कछु संकट होय हमारो’। 
उसी समय मेरी पत्नी ने शीघ्रता से प्रवेश किया और हाथ की थाली स्टूल पर रखते हुए बोली -‘लो, दलिया खा लो।’ 
मैंने कहा -‘अभी हनुमानजी से संकट हरने की प्रार्थना कर रहा था कि तुम यह संकट ले आईं। अरे, खीर नहीं बना सकती थी क्या ?’
वह बोली -‘चावल बादी करते हैं। मुझे टीवी देखना है।’ जितनी झपाटे से वह आई थी उससे ज्यादा सपाटे से वह चलती बनी। मेरी पत्नी सीता के आगे बेचारे हनुमानजी भी मजबूत दिखते हैं, सोचते हुए मैं दलिया निपटाने लगा।
शनिवार को सिविल लाइन जाने की मानसिक तैयारी में जुटा। शाम तक अपने-आपको तैयार करता रहा। दरअसल हिम्मत नहीं हो रही थी। लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे ? कहीं कोई कह न दे -‘भैया, तुम भी बिगड़ गए। कहीं हनुमानजी या उनका पुजारी यह न सोचे, बेटा, अब आए हो जब तकलीफ में पड़े। सुख में कभी याद भी नहीं किया, अब पीड़ा में पड़े तो आ पहुँचे। देवताओं के दरबार में आना ही पड़ता है आदमी को। फिर तुम जैसे अदने आदमी की अकड़ ज्यादा दिनों तक कैसे चलती ? अब घनचक्कर बना दूंगा तुमको। लगाते रहो परिक्रमा। पर जाना तो है ही। सो पाँच बजते-बजते घर के बाहर कदम रख दिया। एक सौ एक रुपए पत्नी ने प्रसाद के लिए पेंट की पाॅकेट में रख दिये थे। 
चार सड़कें -साम, दाम, दंड, भेद सिविल लाइन जाती हैं। किस सड़क पर कदम रखूँ, किसे चुनूँ ? पता नहीं किस सड़क पर चलकर पहुँचने वालों की पहले सुनी जाती है। चौराहे पर आया तो चक्कर में पड़ गया। फिर सोचा, क्यों न गली कूचों से चला चलूँ। आज न सुनी जायेगी तो मंगल को फिर विनती कर लेंगे। कई शनिवार और मंगल लगेंगे अभी तो।
हनुमान मंदिर के नजदीक पहुँचा तो मंदिर के बाहर काफी चहल-पहल दिखी। अनेक सरकारी गाडि़याँ, स्कूटर, बाइक्स आदि वहाँ खड़े थे। सजी-धजी महिलाएँ, चपल नवयुवतियाँ, नजरें फेंकते प्रौढ़ पुरुष, फिकरे कसते नौजवान, खादीधारी, टेरीकाट-जींसधारी सभी तरह के लोग आ-जा रहे थे। कई परिचित चेहरे भी दिखे। पुलिस इंस्पेक्टर मातादीन दर्शन कर चले आ रहे थे। नमस्कार कर पूछा -‘आप कैसे ?’ 
बोले -‘साले, एसपी ने इधर लाइन अटैच कर दिया है। एक शोहदे को चार-पाँच बेंत सटकार दिये थे। वह किसी का भाई-भतीजा था साला। अब हनुमानजी की मेहरबानी हो तो वापस थाना मिल जाये। भंडारा कर दूंगा।’ और वह चले गये।
सेठ बिहारीलाल अपनी गजकाया पत्नी के साथ हाथी की चाल से चले आ रहे थे, पूछा -‘सेठजी, कैसे ?’
‘संकटमोचन के दरबार में अर्जी लगाने आया था जी। पाँच सौ बारे ज्यादा दिखाकर खाद्य विभाग ने मुकदमा चला दिया। हफ्ता पहुँचाने के बाद यह हाल है। बच गया तो चोला चढ़ाऊंगा।’ कहते हुए दोनों अपनी कार में धसे और चलते बने। 
तभी तेज हाॅर्न बजने लगा तो किनारे हो गया। देखा, राज्य मंत्री की कार थी। एक एमएलए भी बैठा था। हनुमानजी की कृपा से कोई काम मुश्किल नहीं, ऐसा मान वे दर्शनों को आये होंगे। डायरेक्टर आहूजा भी दिखे। पत्नी और कन्या के साथ पुड़े और मालाओं से लदे थे। पाँच-पाँच लाख में पचासों भर्तियों का आरोप विधानसभा में उन पर लगाया गया था। डाॅक्टर सोनी भी दिखे। बेचारे का ट्रांसफर किसी प्राथमिक चिकित्सा केंद्र में कर दिया गया था। जुल्फें छितराये, गले में रंग-बिरंगा छींट का रूमाल बाँधे, चार-पाँच छोकरों से घिरा नत्थू सिंह भी दिखा। बलात्कार के आरोप में पिछले दिनों पकड़ा गया था और अब जमानत पर था। इंजीनियर बाधवानी भी दिखे। उनकी सीमेंट घपले की इन्क्वायरी चल रही है। प्रो. कंचनकुमार अपनी नई नवेली पत्नी के साथ दिखे जो कुछ वर्ष पहले उनकी स्टूडेंट थी। अभी हाल में उन्होंने कोर्ट मैरिज की थी। संतान कामना से हनुमान मंदिर दर्शन के लिए आए थे। और भी कई लोग थे। अनेक समस्याएँ, अनगिनत कष्ट थे उन सबके। सभी को भरोसा था कि हनुमान दरबार में उनके संकट दूर हो सकेंगे। वे भी हनुमानजी से कुछ न कुछ वायदा कर आये थे, करने वाले थे। हनुमान मंदिर का वैभव और सजावट उन सबकी कृतज्ञ प्रवृत्ति का परिणाम थी।
मेरे मन में फिर शंका का संचार हुआ। कैसी-कैसी महत्वपूर्ण मुसीबतों को हरने का काम है हनुमानजी के पास। भला मेरी पीड़ा हरने के लिए उन्हें समय मिलेगा, याद रहेगी मेरी पीड़ा ? फिर भी अंदर की ओर बढ़ा। गर्भगृह के बाहर दो पुजारी बैठे हैं। भीड़ है उनके पास। धक्का-मुक्की भी चल रही है। पुजारीगण प्रसाद, नारियल, मालाएँ लेकर गर्भगृह में बैठे मुख्य पुजारी की ओर बढ़ा देते हैं। मैं भी लाइन में लग गया। तभी वह मिनिस्टर आया। साथ में एमएलए आया। दर्शनार्थियों में हड़बड़ी मच गई। पुजारी खड़े हो गये। झुककर बोले -‘हटो रास्ता दो, मिनिस्टर साहब हैं। आइए साहब, आइए श्रीमान।’
श्रीमान मुस्कराते चेहरे से, इधर-उधर नजर फेंकते, नमस्कारों के उत्तर में सिर हिलाते गर्भगृह में घुस गये। खड़ा हुआ मुख्य पुजारी बोला -‘स्वागत है, अब आपके केबिनेट में जाने के अवसर बढ़ गये हैं। हाईकमान को हनुमानजी स्वप्न में हुक्म देने ही वाले हैं और भैयाजी, आप भी किसी निगम के अध्यक्ष होनेवाले हैं। मंत्री का दर्जा मिलेगा। बोलो -हनुमानजी की जय !’ पूरा मंदिर जय जयकार से गूँज उठा। घंटे टनटना उठे।
मुख्य पुजारी बोला -‘श्रीमान, यदि अनुकंपा हो जाये और मंदिर के पास एक धर्मशाला बन जाये तो भक्तों का कष्ट दूर हो जायेगा।’ तभी इंजीनियर बाधवानी लाइन को छोड़ता हुआ आ खड़ा हुआ और मिनिस्टर को नमस्कार कर चरणों में झुक गया। मंत्रीजी खिल गये। बोले -‘लो धर्मशाला का डौल हो गया। बाधवानी, कुछ करो इंतजाम। धरम का काम है।’
‘जी सर, आपकी दुआ से हो जायेगा।’ बाधवानी ने हाथ जोड़े-जोड़े ही कहा।
आहूजा, नत्थूसिंह, कंचन कुमार और दो-तीन और मिनिस्टर तक आ गये थे, मुस्कराकर नमस्कार कर रहे थे। 
‘क्यों नत्थू सिंह क्या हाल है ?’ मिनिस्टर ने पूछा।
‘ठीक है साब, मेरी छवि बिगाड़ी जा रही है। झूठे आरोप में फँसाया गया हूँ।’ नत्थूसिंह बोला।
‘भाई, हनुमानजी सबका संकट हरते हैं।’ मिनिस्टर बोले। फिर हनुमानजी को नमन कर कुछ बुदबुदाते रहे और सबके साथ गर्भगृह के बाहर आ गये। चारों-पाँचों उनके पीछे-पीछे थे।
मैं यह सब नजारा नजदीक से देख-सुन रहा था। कैसे-कैसे और कितने लोग हनुमानजी के मंदिर में हाजिर होते हैं। तभी देखा, एक औरत दो छोटे-छोटे बच्चों के लिए पुजारियों के पास खड़ी उलझ रही थी। वह गर्भगृह तक जाना चाहती थी। वह कह रही थी -‘महाराज, मुझे मूर्ति तक जाने दो। वहीं मैं प्रसाद चढ़ाऊंगी। छह-सात बार आ चुकी हूँ पर काम नहीं हुआ। मुसीबत की मारी हूँ महाराज, मुझे भीतर जाने दो।’
मैं उस औरत के पास पहुँचा। उसकी नजरों का याचना भाव मुझे अंदर तक भेद गया। मैंने पूछा -‘क्या मुसीबत है तुम्हारी ?’ वह बोली -‘तीन साल हो गये मेरे पति को मरे। शिक्षा विभाग में चपरासी थे। अभी तक न पिंसन मिली, न फंड का पैसा। ससुरे दफ्तर वाले कहते हैं कि सरबस बुक नहीं मिल रही। फंड का हिसाब नहीं है। मुझे भी काम पर नहीं लगाते। पाँच हजार रुपये माँगते हैं। अब हनुमानजी के दरबार में आई हूँ विनती करने।’ औरत की आँखें छलछला उठी थी।
मैंने पुजारी से पूछा -‘क्यों नहीं जाने देते इस बेचारी को ?’
पुजारी ने मुझे गहरी नजर से देखा और पूछा -‘आप क्या कोई नेता हैं ? पत्रकार हैं ?’
‘नहीं, मैं आदमी हूँ’, मैं बोला।
‘अगर आप आदमी हैं तो आपको नजर आया होगा कि मूर्ति तक किन-किन को जाने दिया जाता है।’ पुजारी बोला।
‘पर यह तो मुसीबत की मारी है, गरीब, असहाय विधवा है। इसे जाने दो।’
‘सभी मुसीबत के मारे यहाँ आते हैं। सभी हनुमानजी के आगे गरीब और असहाय हैं, और हम मुख्य पुजारी के सामने।’ पुजारी बुदबुदाया।
मुझे लगा कैसे-कैसे भूत-प्रेत हनुमानजी को घेरे हैं जबकि तुलसी ने कहा है -भूत पिशाच निकट नहीं आवा, महावीर जब नाम सुनावा। मैंने गर्भगृह की ओर नजर घुमाई, देखा मुख्य पुजारी मुझे घूर रहा है। उसकी भंगिमा भौंडी हो गयी थी। हनुमानजी तक अपन कष्ट निवारण की प्रार्थना पहुँचाने का उत्साह मरता-सा लगा। कहीं सिविल लाइन वाले हनुमानजी ऐसी ही मुख-मुद्रा बनाकर मुझे न घूर उठें। चलें, बाहर चलें।
मैं बाहर आ गया। सोचा, सिविल लाइन वाले हनुमान मेरी पीड़ा नहीं हरेंगे। मैं तो मंगल को मरघटिया महावीर के पास ही जाऊंगा। उनसे विनती करूंगा -हे पवनपुत्र, इस रावण राज्य को अब आग लगा दो, यह राम का ही काज है। लंका धू-धू कर जले, मेरे उसके, सबके असह्य कष्ट उसमें जल जायेंगे। जल्दी करो, महावीर।
मैं घर आ गया। पत्नी के हाथों पर एक सौ एक रुपये रखे तो वह मुँह देखने लगी। मैंने कहा -‘मुँह क्या देख रही हो। अगले मंगल को मरघटिया हनुमान के दर्शन करने जाऊंगा। अब सिविल लाइन नहीं जाऊंगा।‘ सीता मेरा मुँह देखे जा रही थी।

"श्री हरिकृष्ण तैलंग स्मृति सम्मान"


कृपया पधारिये .."श्री हरिकृष्ण तैलंग स्मृति सम्मान"

29 दिसंबर 2014, सोमवार, शाम 4 बजे 
"मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन सभागृह 
(पी.एंड टी. चैराहा, शास्त्री नगर), भोपाल 
में दिवंगत साहित्यकार की स्मृति में स्थापित 
प्रथम "श्री हरिकृष्ण तैलंग स्मृति सम्मान" 
कानपुर के मूर्धन्य बाल साहित्यकार डाॅ. राष्ट्रबंधु 
और भोपाल के युवा व्यंग्यकार श्री शान्तिलाल जैन 
को  प्रदान किया जाएगा.

"शिकारी और भोले कबूतर"


लघुकथा/ हरिकृष्ण तैलंग 
 "शिकारी और भोले कबूतर"

(यह लघुकथा "सारिका" के बहुचर्चित आपातकाल अंक में छपी थी )

शिकारी ने जाल फैलाया। चार कबूतर उसमें आ फँसे। ओट में छिपा शिकारी खुश होता हुआ उनके पास आया। उसने कबूतरों की गर्दन मरोड़ने के लिए हाथ फैलाया ही था कि कबूतरों ने गिड़गिड़ाकर प्रार्थना की, ‘महाशय, हम गरीब और निरीह पक्षी हैं। हमारे छोटे-छोटे बच्चे हैं। यदि आप हमें मार डालेंगे तो नन्हे-नन्हे बेपर के बच्चे बेसहारा हो जायेंगे। उनका पालन-पोषण फिर कौन करेगा ? मेहरबानी करके हमें छोड़ दें। आपको अपने बाल-बच्चों की कसम है।’
शिकारी का दिल यह रूदन सुनकर भर आया। पर दूसरे ही क्षण उसकी जीभ पर कबूतरों के स्वादिष्ट माँस का जायका तैर आया। तब भी वह बाल-बच्चों की कसम उतारना चाहता था। एक क्षण सोचकर उसने कबूतरों से कहा, ‘मुझे तुम लोगों पर दया आ गई है। अब मैं तुम लोगों को नहीं मारूँगा। तुम लोगों को उड़ जाने की अब पूरी आजादी है।’
कबूतर बड़े खुश हुए। सच्चे दिल से उन्होंने शिकारी को दुआएँ दीं। फिर उड़ जाने की कोशिश करने लगे। पर जाल में पैर फँसे होने के कारण बेचारे फड़फड़ा कर रह जाते। जी-तोड़ मेहनत और भूख-प्यास ने उनका शरीर तोड़ डाला। कुछ घंटों बाद वे स्वयं मर गये।
शाम को शिकारी फिर आया। कबूतर उठाये और खुश होता हुआ घर लौट गया।
शिकारी जाल अब भी फैलाता है, पर जाल में फँसे हुए भोले कबूतरों को उड़ जाने की आजादी देकर वह दयावान कहलाना सीख गया है।

आम आदमी पर बहस: अंतर्कथा/ हरिकृष्ण तैलंग


दिवंगत साहित्यकार की स्मृति में स्थापित प्रथम "श्री हरिकृष्ण तैलंग स्मृति सम्मान" कानपुर के मूर्धन्य बाल साहित्यकार डाॅ. राष्ट्रबंधु और भोपाल के युवा व्यंग्यकार श्री शान्तिलाल जैन को 29 दिसंबर 2014, सोमवार, शाम 4 बजे "मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन सभागृह (पी.एंड टी. चैराहा, शास्त्री नगर), भोपाल प्रदान किया जाएगा. ज्ञातव्य है, इस माह 27 दिसंबर को वरिष्ठ रचनाकार हरिकृष्ण तैलंग की 80वीं सालगिरह है। ईश्वर ने गत हिंदी दिवस, 14 सितंबर 2014 को उन्हें अपने पास बुला लिया परंतु अपनी यादगार रचनाओं के बलबूते स्व. तैलंग हमारे बीच सदैव रहेंगे। "धर्मयुग" में प्रकाशित उनका एक चर्चित व्यंग्य पढ़िए
आम आदमी पर बहस: अंतर्कथा
राजनीति के साथ साहित्य में भी आम आदमी अब खास बन गया है। साहित्य की पुरानी विधाएँ, जो विधवा हो चकी हैं, आदमी के दिल और आँखों से सरोकार रखती थीं। पुराने साहित्य का आदमी अमूमन राजा अथवा अमीरजादा होता था। उसके दिल और जिस्म के दुःख-दर्दों की गाथा और आँसुओं का नमकीनपन इतना जायकेदार होता था कि लाखों लोग उसे दिन में पढ़ते थे (क्योंकि तब बिजली थी नहीं) और अपनी रातें रो-रोकर बिताते थे। जमाना पलटा और सुंदरियों व छैलाओं की जगह आम आदमी आन विराजा। कारण एक यह भी था कि पुरानी सुंदरियाँ सब जूठी हो चुकी थीं। आम आदमी के आर्थिक शोषण और अपमान के सूक्ष्म चित्रण, जो दिल के दर्द से ज्यादा दर्दनाक होते हैं और हो सकते हैं क्योंकि ये रचनाकार के सामर्थ पर निर्भर करते हैं, गहरे आधुनिक बोध में धँसा साहित्यकार अपनी पूरी ताकत से रचनाओं में करने को बाध्य हुआ। अगर आम आदमी के दर्द को उसकी भाषा अभिव्यक्ति देने में असमर्थता जताती है तो वह अश्लील गालियों का इस्तेमाल कर रचना को असरदार बना देता है। दरअसल, यह कोई घटिया सृजन नहीं है क्योंकि आम आदमी और अश्लीलता पर्यायवाची शब्द जो हैं।
पुराने जमाने में साहित्य का प्रणेता राज्य का आश्रय पाता था या कहें, राज्य खुद उसे आश्रय देता था। तब वह बढि़या काव्य कृतियाँ रच देता था या शासन उससे रचवा लेता था। जाहिर है, आज के प्रजातंत्रीय शासन में भी अपने साहित्य कला धर्म को निभाने के लिए आम आदमी, जो राजनेताओं के भाषणों और विज्ञापनों को छोड़कर कहीं नहीं मिला, के बखूबी चित्रण में समर्थ साहित्यकारों द्वारा उस पकड़ में न आनेवाले आम आदमी की तलाश गहरी दिलचस्पी से कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं। 
शासन ऐसे खोजी साहित्यकारों को अकादमियों, विश्वविद्यालयों, सरकारी पत्र-पत्रिकाओं और प्रशासनिक सेवाओं में ऊँचे पद और पुरस्कार मुहैया कर रहा है। उनके साहित्य की अच्छी सरकारी खरीद हो जाती है और उनका शिखर सम्मान जारी रहता है। शासन की मंशा यह है कि चूँकि वह अन्य गंभीर समस्याओं में बेहद व्यस्त रहता है, इसलिए ऐसे साहित्यकार उस आम आदमी को खोजकर उसके रू-ब-रू खड़ा कर सकें जिसके लिए वह बेहद परेशान रहकर -’दीनू का पक्ष शासन का पक्ष है’- के विज्ञापन अकसर अखबारों को रिलीज कर मोटी रकम देता रहता है।
ऐसे उदात्त लक्ष्य से ग्रसित समर्थ साहित्यकार राजधानियों और महानगरों के संत्रास भरे माहौल में कोंडागाँव और दूसरे गाँवों से पदयात्रा करते-करते अपनी मुहिम पर डटे हुए हैं। दरअसल, यह बेहद जरूरी और सुविधाजनक है, क्योंकि आम आदमी बराबर गाँवों से उकता-उकता कर कभी-न-कभी महानगरों, राजधानियों की यात्रा पर निकल ही पड़ता है। अतः जैसे ही वह पकड़ में आया, आनन-फानन वे उसे नजदीक के शासकीय थाने के हवाले कर देंगे।
ऐसी अद्भुत वीरोचित निष्ठा से हमारा साहित्यकार फ्लैटों, बंगलों, मोबाइल, वाइ-फाई, सरकारी गाडि़यों से लैस अपना सामाजिक दायित्व डाकुओं को पकड़नेवाली विशेष पुलिस से कहीं अधिक सतर्कता से निभा रहा है। फिर भी शासन की दोहरी नीति के कारण वह बेचारा शराब और सुंदरियों से विशेष पुलिस की अपेक्षा कहीं अधिक वंचित है। कुछ अधिक संवेदनशील साहित्यकार इस पक्षपात से मन-ही-मन झुँझलाते रहते हैं और शुद्ध देशी के सहारे उसे झेलने की नियति सह रहे हैं। 
ऐसे उत्साही साहित्यकारों ने हर राजधानी और नगर में ऐसी संस्थाएँ गठित कर रखी हैं जो वक्त-बेवक्त साहित्यिक आयोजनों में आम आदमी को हर कोण और गहरे नजरिए से खास-खास आदमियों के रू-ब-रू कराने का महत्वपूर्ण काम करती रहती हैं। वहाँ दीनू और धनिया -जिन्हें शासन विज्ञापित करता रहता है, उन आयोजनों में बराबर शिरकत करते हैं और टेंट गाड़ने, कुर्सियाँ उठाने-धरने, जूठे बर्तन और कप-प्लेटें उठाने का काम बड़ी मुस्तैदी और उम्मीदों से गई रात तक करते रहते हैं। फिर अपनी-अपनी गुदडि़यों में उस नई सुबह के इंतजार में दुबक कर सो जाते हैं, जब उन्हें फिर कुर्सियाँ लादनी पड़ेंगी, बर्तन माँजने पड़ेंगे, कप धोने पड़ेंगे और झाडू़ लगानी पड़ेगी।
राजधानी की साहित्यिक संस्था ‘आम जन साहित्य संघ’ ने भी तय किया कि अब समय आ गया है जब नगर में ‘बीते दशक के साहित्य में आम आदमी की महायात्रा का आंकलन’ विषयक अखिल भारतीय विचार गोष्ठी आयोजित कर लिया जाए। तीन दिन के गहन कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार कर ली गई। बजट बनाया गया। आम आदमी पर बहस के लिए कम-से-कम दस लाख तो चाहिए ही। पाँचेक लाख शासकीय अनुदान मिल जाए तो बाकी राशि स्मारिका, नवोदित साहित्यकारों, सेठ-साहूकारों और साहित्य प्रेमी अफसरों के सहयोग से जुटा ली जाएगी। शासन पाँच लाख दे ही देगा, क्योंकि वर्तमान पंच वर्षीय योजना में साहित्य, कला और संस्कृति के विकास के लिए शासन ने उतनी राशि रख छोड़ी है जितना किसी एक निगम में वर्ष भर का घाटा होता है या किसी छोटी बाँध परियोजना में सीमेंट का घोटाला हो जाता है या खाद्य निगम महीने में उतना गेहूँ सड़ा डालता है। 
जैसे एक करोड़पति अपने परिवार की प्रौढ़ाओं के लिए सौंदर्य प्रसाधनों पर प्रतिवर्ष व्यय करता है, उसी प्रकार शासन भी अपने अरबपति स्वभाव के अनुरूप कला और साहित्य-संस्कृति मंत्रालय को राशि मुहैया कर देता है। जिस तरह करोड़पति परिवार की प्रौढ़ाएँ अपनी-अपनी पसंद के ब्रांडवाले फेसवाॅश, पाउडर, लेवेंडर, लिपिस्टिक, हेयर डाई, परफ्यूम आदि इस्तेमाल कर अपनी झुर्रियों और दागों को छवि प्रदान करती हैं, वैसे ही शासन का सांस्कृतिक सचिव अपनी पसंद के ब्रांडवाली कला और साहित्य पर बजट की राशि के खर्च द्वारा शासन की छवि निखारे रखता है।
सो साहित्य संघ के पदाधिकारियों ने अपने प्रदेश के प्रबुद्ध संस्कृति सचिव से भेंट कर अनुदान प्राप्त करने का निश्चय किया। संस्कृति सचिव सौभाग्य से कठिन प्रतीकवादी कविता और कला विचारों के लिए विख्यात थे ही। उनकी कृपा से कला और साहित्य प्रदेश में छलाँगे भर रहा था। सचमुच प्रदेश ने तीन चीजों में अखिल भारतीय चमत्कार दिखाए हैं। पहली चीज जंगल, दूसरी संरक्षित जंगली जानवर और तीसरी कलाएँ और साहित्य। ये चीजें बराबर एक-दूसरे से होड़ कर रही हैं। सच पूछा जाए तो जंगल, जंगली जानवर और साहित्य, विशेषकर गूढ़ प्रतीकवाली कविताएँ, एक ही सिक्के के तीन पहलू हैं। जंगल होंगे तो जंगली जानवर होंगे। जंगली जानवर होंगे तो कविताओं के लिए प्रतीक भरपूर मिलेंगे। हमारी सरकार इस भौतिक सत्य को बखूबी समझती है, तभी उसने तीनों को संरक्षित कर रखा है और तीनों क्षेत्रों में बढ़-चढ़कर कीर्तिमान स्थापित किए हैं। ऐसे अनुकूल अवसर पर पाँच लाख मिलने में कोई खास दिक्कत नहीं आएगी, बशर्ते सचिव महोदय कृपावंत हो जाएँ। 
एक संध्या को संस्था के पदाधिकारीगण संस्कृति सचिव के बँगले पर पहुँचे। उन्हें अपनी योजना बताई। आशीर्वाद और मार्गदर्शन चाहा। फिर विनयावत होकर पाँच लाख के शासकीय अनुदान राशि का प्रार्थना पत्र सेवा में प्रस्तुत किया। इस दौरान सचिव महोदय ने इधर-उधर पाँच-सात फोन किए। अपनी कुतिया को, जो बार-बार आकर खड़ी हो जाती थी, तीन बार सहलाया। गंभीर मुद्रा में दो-तीन अधीनस्थों को जो निजी काम से आए थे, डाँट पिलाई। फिर साहित्य संघ के अध्यक्ष से बोले, आप किन-किन बहसकारों और कवियों को बुला रहे हैं ?’
अध्यक्ष ने एक लिस्ट उनके सम्मुख रखते हुए निवेदन किया, ‘सर, अभी फाइनल तो कुछ भी नहीं किया। फिर भी ये नाम हमें सूझे हैं। कुछ नाम आप भी सुझा दें तो कृपा होगी।’ 
सचिव ने लिस्ट पर नजर फेरी। मुंबई के लोगों के नाम पढ़कर उन्होंने मुँह बिचकाया और अपनी कलम से क्राॅस लगा दिया। दिल्ली के पाँच लोगों पर टिक लगाकर दो नाम और जोड़े। त्रिवेंद्रम और हापुड़वालों के नाम भी लिख दिए। भोपाल के तीन नाम रहने दए, इंदौर-उज्जैन, सागर से भी एक-एक नाम लिखे। तीन-चार नाम और सुझाए और बोले, ‘इन लोगों को भी बुला लीजिए। आप चाहेंगे तो कुछ लोगों को मैं लिख दूँगा।’
‘तब तो बड़ी सुविधा हो जाएगी, सर !’ संस्था के मंत्री प्रफुल्लित हो बाग-बाग हो गए। अनेक फूल, भिन्न-भिन्न जाति के उनके चेहरे पर खिल उठे। अध्यक्ष और मंत्री का अंतरमन समझ गया कि अनुदान मिलने के चांसेस ज्यादा हैं। अपने काँटेदार दाँत निपोरते हुए मंत्री बोले, ‘दरअसल, हम लोग आपके मार्गदर्शन के लिए ही आए हैं। आपके सुझाए नाम तो हमारे दिमाग से उड़ ही गए थे, जिन्हें याद रखना बेहद जरूरी था। सर, हम लोग स्मारिका भी छपवा रहे हैं। अगर दो-तीन विज्ञापन जनसंपर्क विभाग दे दे तो सहूलियत हो जाएगी।’
‘कह दूँगा।’ सचिव ने गंभीर होकर उत्तर दिया।
‘सर, गोल्डी बिटिया अब क्या कर रही है ? हाई स्कूल में थी तब तो बड़ी अच्छी कविताएँ करती थी।’ प्रोफेसर सुमंगलकुमार ने पूछा।
‘आजकल वनस्थली में है। कविता के साथ ही अब उसे कविता और घुड़सवारी का शौक हो गया है। तीनों में अच्छी प्रगति है उसकी। आपने ‘मधुमती’ में उसकी कविता देखी थी क्या ?’ सचिव ने प्रसन्न भाव से प्रोफेसर से पूछा।
‘अच्छा, मधुमती में छपी है उसकी कविता ! आखिर संस्कार कहाँ जाएँगे !’ प्रोफेसर चहकते स्वर में बोले।
‘सर, गोल्डी बिटिया की कुछ कविताएँ और कव्हर पेज के लिए कथक मुद्रा में एक फोटो मँगवा दीजिए न, स्मारिका की शोभा बढ़ जाएगी।’ मंत्रीजी बोल पड़े।
‘कह दूँगा, पर मूडी है वह। देखो ई-मेल करती है कि नहीं।’ सचिव ने कहा।
‘दो-तीन दिन बाद हम आपको याद दिला देंगे, सर। आप कह तो दीजिए ही। अपने नगर के साहित्यिक आयोजन की स्मारिका में अपनी बिटिया की कविताएँ न छपे, यह कैसे हो सकता है ! फिर नए लोगों को तो प्रकाश में आना ही चाहिए।’ अध्यक्ष ने दृढ़ता से कहा और अपनी कार्यकारिणी की ओर देखा। सब सिर हिला उठे थे।
‘सर, आयोजन के विभिन्न सत्रों के उदघाटनकर्ता, अध्यक्ष भी तय करने थे।’ मंत्री ने फिर अपने दाँत बाहर कर पूछा।
‘यह सब फिर। आप मिलते रहिए बीच-बीच में।’ सचिव ने कहा।
‘जी हाँ, जी हाँ। यह सब तो फिर तय हो सकता है। अनुदान स्वीकृत हो जाए तो अधिक चिंता न रहती।’ अध्यक्ष बोले।
‘देखिए, मैं अपनी तरफ से अधिकाधिक अनुदान रिकमंड कर दूँगा, पर भाई मंत्रीजी कितना स्वीकृत करेंगे, कह नहीं सकता। उनसे भी आप लोग मुलाकात कर लीजिए। देखिए, मुख्यमंत्रीजी का भानजा शीलकुमार बड़ा अच्छा चित्रकार है। आप उससे कुछ चित्र स्मारिका के लिए ले लें तो अच्छा रहेगा।’ सचिव ने कारगर सुझाव दिया।
‘अरे वाह, यह तो बढि़या रहेगा ! हम लोग कल-परसों में ही मुख्यमंत्रीजी और संस्कृति मंत्री से मुलाकात कर लेते हैं और शीलकुमारजी से भी विनती कर लेंगे।’ अध्यक्ष चहककर बोले।
चाय आ गई। काली थी, कड़वी थी पर साहित्य संघ के पदाधिकारियों ने उसे बड़े चाव से पिया। अपनी इज्जत हुई समझकर वे परम तुष्ट हुए और सचिव के सुसंस्कृत होने का गहरा अहसास वे करते रहे। चलते समय सब सचिव को हाथ जोड़-जोड़कर बाहर आ गए। उन सबकी मुखमुद्रा मोहक हो उठी थी।
साहित्य संस्थान के पदाधिकारियों ने मुख्यमंत्री और मंत्री से मुलाकात ले ली। शीलकुमारजी से भी विनती कर ली। संस्कृति सचिव से बराबर संपर्क बनाए रहे। गोल्डी बिटिया की कविताएँ और फोटो मिल गए। आयोजन की तिथियाँ नजदीक सरकती आ गईं। स्मारिका छप गईं, जनसंपर्क विभाग ने तीन विज्ञापन और शासन से वांछित अनुदान भी कृपापूर्वक मिल गए थे। 
आम आदमी पर बहस आयोजन के तीन दिवसीय कार्यक्रमों का लब्बोलुआब यह रहा -आमंत्रित बहसकार और कविगण नगर की तीन आलीशान होटल्स में ठहराए गए थे क्योंकि वे सब एक साथ नहीं ठहरना चाहते थे। स्टेशन पर ही इस बात पर विवाद खड़ा हो गया था जो आयोजकों के सिरदर्द का कारण बना। पर चूँकि सिरदर्द की टेबलेट्स उनकी पाॅकेट में थीं, अतः उन्हें गुटक कर और ठंड में भी ठंडा पानी पीकर उन्होंने चतुराई से विवाद टाला और मनचाहे होटलों में मनचाहे साथियों के साथ सबकी व्यवस्था की।
कार्यक्रम का उदघाटन माननीय मुख्यमंत्रीजी ने किया, इसलिए अच्छी-खासी भीड़ और पुलिस की व्यवस्था रही। चंद विद्वानों के भाषण हुए जिनमें आधुनिक साहित्य में आम आदमी के जिक्र की अहमियत पर रोशनी डाली गई। परिचर्चा दूसरे दिन शिक्षा मंत्री की अध्यक्षता में होनी थी, पर वे व्यस्तता के कारण नहीं आए। अतः अध्यक्षता कृषि सचिव ने की। आखिर कल्चर और एग्रीकल्चर एक-दूसरे से काफी साम्य जो रखते हैं। पाँच परचे पढ़े गए और पंद्रह प्रश्नों पर जोरदार झड़पें हुईं। बहसकार परस्पर आरोपों-प्रत्यारोपों में चीखे-चिल्लाए, एक-दूसरे पर गुर्राए। मेजों पर बराबर घूँसे चलते रहे। इस दौरान कुछ गिलास चकनाचूर हुए और कुछ प्लेट्स फूट गईं। उनके टुकड़े दीनू और धनिया ने बड़ी तत्परता से बीने, वरना कइयों के नाजुक पैर और मासूम चेहरे घायल होकर बदसूरत हो सकते थे। ऐसी जोरदार और शानदार बहस की तीस-पैंतीस उपस्थित श्रोताओं ने, जो सचमुच बुद्धिजीवी थे, नगर में खूब चर्चा की, जिससे काॅफी हाउस और हिंदी के प्रोफेसरों के बैठकखाने गरम होते रहे।
आयोजकों ने तनाव कम करने के लिए बहसकारों और कविगणों को नगर के दर्शनीय स्थलों की सैर कराई। नगर की कुछ उदीयमान कवियित्रियाँ भी साथ थीं। इनसे स्थलों की दर्शनीयता बढ़ गई और आपसी तनाव की तुर्शी कम होने में काफी मदद मिली।
उस रात कई बहसकार और कवि अपने-अपने होटलों में देर रात पहुँचे थे। वहाँ उन्होंने फिर दो-दो पैग व्हिस्की के डाले और दिनभर की थकान से चूर-चूर हो फोम के गद्दों पर निढाल हो सो गए थे।
प्रातःकाल नौ बजे की कवि गोष्ठी का आयोजन साढ़े ग्यारह बजे आरंभ हो सका क्योंकि कवियों के अलावा आज दस-बारह श्रोतागण ही थे। फिर भी कवि गोष्ठी हुई और खूब सराही गई। तीन-तीन, चार-चार पेजी कविताएँ कवियों ने सुनाईं और परस्पर खूब वाहवाही की।
दीनू और धनिया, जो बराबर खड़े शिरकत कर रहे थे, को केवल चिडि़या, बाज, लकड़बग्घा, रोटी, गदराए बदनवाली लड़की, सुअर जैसे चंद शब्द ही समझ में आए। आखिर उन्हें कविता समझकर करना भी क्या था ? वे तो इस फिक्र में थे कि साहब लोग जाएँ तो कुर्सियाँ और दरियाँ समेटें। उन्हें एक-दो बार मिनरल वाॅटर और गरम चाय तथा बिस्कुट की प्लेटें भी बाँटनी पड़ी थीं। तीसरे दिन शाम तक होटल खाली हो गए थे। आयोजकों ने होटलों के बिल चुकाए। एक लाख तिरेसठ हजार रुपए देने पड़े थे। बहसकार और कविगण अपना यात्रा व्यय और पारिश्रमिक ले गए। टेंट, बिजली और अन्य व्यवस्थाओं में भी डेढ़ेक लाख रुपए व्यय हुए। प्रेस का बिल तिरेपन हजार सात सौ का था। दीनू व धनिया की पौने चार सौ रुपए मजदूरी बकाया रही जो अभी तक नहीं दी गई है।
दीनू से आयोजक कहते हैं कि स्मारिका के विज्ञापनों का कुछ पैसा अटका पड़ा है, वह मिल जाए तो दीनू व धनिया की बकाया मजदूरी का भुगतान कर दिया जाएगा। दो-तीन हफ्ते भटकने के बाद दीनू और धनिया उन पैसों की उम्मीद ही छोड़ बैठे हैं।