गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

"पतंग बोली" (हरिकृष्ण तैलंग की यादगार बाल कहानी )

"पतंग बोली"

(हरिकृष्ण तैलंग की यादगार बाल कहानी )

//कई दशक पूर्व, टाइम्स आॅफ इंडिया ग्रुप की बाल पत्रिका ‘पराग’ के यशस्वी संपादक श्री आनंदप्रकाश जैन ने श्री हरिकृष्ण तैलंग की अनेक कहानियाँ आकर्षक ढंग से प्रकाशित की थीं। उन्हीं लोकप्रिय कहानियों का एक संग्रह ‘पतंग बोली’ आया जिसे तब मप्र शिक्षा विभाग ने पुरस्कृत किया था।//
रमेश अपने दोस्तों में पतंगबाज के नाम से मशहूर था। उसे रंग-बिरंगी पतंगों का आकाश में अठखेलियाँ करना खूब भाता था। वह पतंग को खूब ऊँचा उड़ा कर ठुमकियाँ खिलाया करता। पेंच लड़ाकर किसी की पतंग को काट देता तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहता। वह अपने साथियों की कितनी पतंगें काट चुका, उसकी कहानी वह जब-तब बड़ी शान से सुनाया करता। मित्र जब उसकी तारीफ करते तो वह फूल कर कुप्पा हो जाता।
परंतु घरवाले उसके इस शौक को दबाना चाहते थे। जब उसकी माँ उसे प्यार से समझाती, तो रमेश उसकी बातें हँसी में टाल देता। कभी कहता कि बड़े लेग भी तो बचपन में पतंग उड़ाते थे। राजा राम तक पतंग उड़ाया करते थे। उनकी पतंग एक बार तो देवलोक में किसी देवकन्या ने रोक ली थी। वह भी पतंग उड़ाता है तो क्या बुरा करता है। तरह-तरह के और भी तर्क रमेश को आते थे। वह समझ नहीं पाता था कि उसे पतंग उड़ाने से क्यों रोका जाता है। यह खेल ऐसा कोई खतरनाक भी तो नहीं। हाॅकी-फुटबाल में तो आँख फूटने और टाँग टूटने का खतरा रहता है। लोग कहा करते थे कि पतंग उड़ाने वालों का मन पढ़ाई लिखाई में नहीं लगता। यह दलील भी उसे हल्की-फुल्की लगती। वह जानता था कि बेंजामिन फ्रेंकलिन ने पतंगबाजी से ही बिजली का पता लगाया था। बेचारी सीधी सादी माँ इन बातों को क्या जाने। इसीलिए रमेश माँ की बात इस कान सुनता और उस कान निकाल देता।
रमेश का मन अब पढ़ने-लिखने से उचटने लगा। धीरे-धीरे उसका स्कूल जाना भी कम होने लगा। वह अपने घर से चुपके से पतंग उठाता और स्कूल जाने का बहाना कर दूर के मैदान में पतंग उड़ाया करता। वहाँ रंगीन पंतगों की उड़ान पर लोगों को पतंग लूटने की राह ताकते देखता तो घमंड से अपनी चरखी को नचाता।
अब उसे किसी की परवाह नहीं रह गई थी। घर में उसकी शिकायत पहुँचती तो वह बहानेबाजी का दाँव काम में लाता। सच्ची बात मालूम होने पर एक दिन उसके पिता ने उसे पीट भी दिया लेकिन अब देर हो चुकी थी। बहुत दिनों से छूटी पढ़ाई उसे फिर आकर्षित न कर सकी। नतीजा यह हुआ कि रमेश सालाना परीक्षा में फैल हो गया। उसके साथी आगे की कक्षा में पहुँच गये थे। रमेश को अब माँ-बाप का डाँटना मारना काफी खलता था। वह स्वयं भी अपने शिक्षकों और साथियों के सामने निकलने में झिझकता था। मजे की बात यह हुई थी कि उसकी छोटी बहन मुन्नी पास हो गई थी। इसलिए मुन्नी की तारीफ सभी करते थे। उसके पास होने के दिन माँ ने पड़ोस में मिठाई भी बाँटी थी क्योंकि बच्चों के पास होने की खुशी केवल बच्चों को ही नहीं, उनके माँ-बाप को भी खूब होती है।
उस दिन रमेश स्कूल से अपना परीक्षाफल सुनकर घर आया। रमेश के साथियों से घरवालों को पहले ही उसका नतीजा मालूम हो चुका था। माँ ने उससे कोई बात नहीं की। पिताजी भी खामोश रहे। मुन्नी ने आज उसे बिल्कुल नहीं चिढ़ाया। ऐसा अजीब वातावरण देख, उसने अपनी पतंग उठाई और मैदान में जा पहुँचा। पर उस दिन पतंगबाजी में उसका मन न लगा। सूरज ढलने पर उसने आसमान में उड़ती पतंग को चरखी के सहारे नीचे उतारा और धीरे-धीरे कदम बढ़ाते घर लौट आया।
घर में सन्नाटा-सा छाया था। सब चुपचाप अपने-अपने काम में मशगूल थे। डरते डरते उसने जैसे-तैसे खाना खाया। इस समय भी माँ ने कोई बात नहीं की। माँ का ऐसा अनोखा व्यवहार रमेश को बहुत अखरा। माँ की चुप्पी से उसके हृदय पर चोट लगी। भारी-सा मन लेकर वह सीधा अपने बिछौने पर जाकर लेट गया। माँ, फेल हो जाना, साथियों का आगे बढ़ जाना, पतंगबाजी इन सब के बारे में सोचते-सोचते उसकी बैचेनी नींद की गोदी में खामोशी से खेलने लगी।
थोड़ी देर बाद रमेश को लगा जैसे वह उठा हो। चारों तरफ देखा, तो सवेरा हुआ जान पड़ा। सूरज की रोशनी खिड़की में से आकर, उसके पैरों से खेल रही थी। बाहर चिडि़या ‘चीं-चीं’ करती हुई फुदक रही थीं। खिड़की के पास लगी रातरानी की शाखाएँ धीमे-धीमे हवा में हिल रही थीं। रमेश ने एकदम चादर फेंक दी और हाथ-मुँह धोने जा पहुँचा। वह जल्दी-जल्दी सब काम कर रहा था क्योंकि आज एक पतंगबाज से उसका मैच होने वाला था। ठीक आठ बजे उसे मैदान में पहुँचना था। सब कामों से निबट, रमेश पतंग लेने भीतर पहुँचा। पतंग खूँटी पर टँगी हुई थी। जैसे ही रमेश ने पतंग उठाने हाथ बढ़ाया कि पतंग बोल पड़ी, ‘रमेश, आज मैं तुम्हारे साथ नहीं चलूँगी। मुझे यहीं रहने दो।’
रमेश बड़े अचरज में पड़ गया। फिर भी बोला, ‘अरे ! यह कैसे हो सकता है ! आज तो हमारा मैच है। तुम्हें आज अपना कमाल दिखाना है।’
पतंग बोली, ‘परंतु रमेश, आज मेरा मन नहीं करता। आज मैं कुछ भी न कर सकूँगी। हो सकता है तुम हार जाओ।’
‘कैसी बातें करती हो पतंग रानी ! कल ही तो तुमने कमाल दिखाया था। एकदम चार पतंगें काटी थीं। फिर आज क्या हो गया जो ऐसी बातें करती हो !’ रमेश ने पूछा।
पतंग ने जवाब दिया, ‘आज ही मैं अपनी असलियत समझी हूँ रमेश। अभी तक तो मैं अंधेरे में थी। इसी से खुद से इतराती ही रही, तुम्हें भी मैंने भटका दिया।’
‘मेरी पतंग रानी, सच सच बताओ, बात क्या है ? क्या आज मुझे मात खानी पड़ेगी ? तुम क्या अब सचमुच न चलोगी ?’ रमेश ने खुशामद भरे शब्दों में कहा।
‘ना, रमेश अब मैं न चूलूंगी। मेरी सलाह मानो। अब तुम भी मेरे फेर में न पड़ो। देखो, यदि तुम मुझ में इतने मस्त न हो जाते तो क्या औरों की तरह पास न हो जाते ? मैं तो पिछड़ी हुई हूँ ही, तुम भी अपने साथियों से पिछड़ गये। रमेश, आज के जमाने में पिछड़ना बहुत बुरी बात है। मुझे देखो, जब से मैं पैदा हुई तबसे आज तक वही पुरानी पतंग बनी हुई हूँ। मैं डोर के सहारे उड़ती हूँ तो समझती रही कि मैं सबसे ऊँची हूँ। बड़े-बड़े वृक्ष, टीले और पहाड़ की चोटियाँ मेरी ऊँचाई से शरमाती हैं। मैं बादलों के संग यहाँ से वहाँ उड़ती फिरती हूँ। मुझे और आगे बढ़कर क्या करना है। इसी भ्रम में पड़ी रहकर, आज भी मैं वही हूँ जो पहले थी।
परंतु आज मेरी आँखें खुल गई हैं। मैंने आकाश में अपने से कहीं ऊँचा हवाईजहाज उड़ते देखा। आए दिन राॅकेट भी उड़ते दिखाई देते हैं जो चंद्रमा तक पहुँच चुके हैं और सूर्य, मंगल ग्रह पर उतरने लालायित हैं। उन्हें देख मुझे अपनी क्षुद्रता पर रोना आता है और लज्जा भी लगती है। यदि घमंड में न आकर अपनी तरक्की की कोशिश करती रहती तो आज मुझे डोर के सहारे उड़ने की आवश्यकता न रहती। डोर से ही मेरी ऊँचाई है। जहाँ डोर कटी, मैं हवा में धक्के खाती हुई, विवश हो बेसहारे उड़ती जाती हूँ। फिर कहीं पानी में गिरती हूँ, कहीं काँटों में उलझती हूँ या शैतान बच्चों के हाथ पड़कर अपने शरीर को नुचवाती हूँ। रमेश अब लगातार आगे बढ़ते रहने का युग है। तुम्हें भी अपने आपको योग्य बनाने की मेहनत करना चाहिये ताकि तुम अपनी खुद की योग्यता से आगे बढ़ सको।’ यह सब कहते कहते पतंग का गला भर आया और वह एक लंबी साँस लेकर खामोश हो गई।
एक बार तो रमेश पतंग की यह सीख सुनकर हक्का-बक्का रह गया। फिर बोला, ‘मैंने पतंग को उपदेश देते आज ही सुना है। भला, बच्चे हवाईजहाज और राॅकेट जैसे खतरनाक काम खेल-खेल में कैसे कर सकते हैं ? उनके लिए तो पतंग ही राॅकेट और हवाई जहाज है।’
यह सुनकर पतंग मुस्कराई और बोली, ‘रमेश, तुम फिर भूल कर रहे हो। मेरे भाई, आज के बच्चे ही कल को हवाई जहाज और राॅकेट के चालक बनेंगे। तुम विज्ञान की पत्र-पत्रिकाएँ तथा पुस्तकें पढ़कर बहुत-सा ज्ञान अभी प्राप्त कर सकते हो। जो समय और शक्ति तुम मुझ मुँहजली को उड़ाने में व्यय करते हो वह ही तुम्हें भविष्य में ऊँचा उठाने, आगे बढ़ने में मदद करेंगे। जरा सोचो तो तुम स्वयं अपनी पतंग बन सकते हो।’
इतना कहकर पतंग ने मुस्कराते हुए प्यार से रमेश की ओर देखा।
पतंग की बातें सुनकर रमेश बैचेन हो उठा। उसी समय माथे पर किसी का प्यार भरा स्पर्श अनुभव हुआ। उसने अचानक आँखें खोल दीं। उसकी माँ सिरहाने बैठी सिर पर हाथ फेर उसे जगा रही थी, ‘रमेश, उठो देखो सवेरा हो गया है। जल्दी उठकर दूध पी लो।’
रमेश अब पूरी तरह जग चुका था। वह एकदम उठकर हाथ-मुँह धोने चला गया। आज उसके चेहरे पर एक भिन्न प्रकार के दृढ़ निश्चय की मुस्कान खेल रही थी।

संस्कृत कथा : नैषध चरित्

संस्कृत भाषा का ललित साहित्य विश्व भर में विख्यात है। संस्कृत साहित्य में मानवीय प्रवृत्तियों का रसमय और उदात्त रूप उच्च कलात्मकता से उकेरा गया है। राजसी गरिमा और प्रवृत्तियों के साथ ही सामान्य जन के आचरण और मनोभावों, सामाजिक रीति-रिवाजों, उच्च विचारों, प्रकृति का समृद्ध और अलौकिक सौंदर्य, उसका मानवीयकरण जिस प्रभावी ढंग से, जिस सूक्ष्मता और कुशलता से चित्रित किया गया है, वह अनुपम है। पर कम लोग ही उस अनोखी और समृद्ध सम्पदा से सुपरिचित हैं। इसका कारण संस्कृत भाषा से अनभिज्ञता तथा ग्रंथों का बड़ा आकार है। यदि हम अपनी पुरातन संस्कृति, जो संस्कृत ग्रंथों में बिखरी पड़ी है, से अपरिचित बने रहते हैं तो अपनी ही गरिमा खोते हैं। साथ ही देश की गौरवमयी परम्परा के भागीदार भी नहीं बन पाते। इन्हीं विचारों को लेकर श्री हरिकृष्ण तैलंग ने संस्कृत भाषा के अनेक श्रेष्ठ महाकाव्यों और नाटकों की वृहद कथावस्तु का संक्षिप्त, पर रोचक अनुवाद किया जो उनकी दो पुस्तकों -दिल्ली के किताबघर प्रकाशन गृह से छपीं - "संस्कृत कथाएं" और "बुद्ध चरितम" में भी पढ़े जा हैं।

संस्कृत कथा : नैषध चरित्

(‘नैषध चरित्’ संस्कत साहित्य के सबसे बढि़या महाकाव्यों में से एक है। इस महाकाव्य में निषध नरेश नल और विदर्भ की सुंदर राजकुमारी दमयंती के प्रेम और विवाह की मनोहारी कथा है। मनोहारी कथा के कारण ‘नैषध चरित’ को काव्यों का कीमती हार कहा जाता है। इसके रचनाकार महाकवि श्रीहर्ष 12वीं सदी में कन्नौज के राजा के सभा पंडित थे। राजा के आग्रह पर श्रीहर्ष ने ‘नैषध चरित’ की रचना की थी।)
बहुत पुराने जमाने में निषध नामका एक राज्य था। निषध राज्य अपनी शक्ति और धन-दौलत के लिए संसार प्रसिद्ध था। राजा नल वहाँ राज करते थे। वे जितने सुंदर थे, उतने ही वीर और विद्वान भी थे। अपनी प्रजा का पालन अपनी संतान जैसा करते थे। उनके राज्य में न कोई बिना पढ़ा-लिखा था, न गरीब। सारी प्रजा सुख-चैन से जीवन बिताती थी। उसी काल में विदर्भ राज्य के राजा भीमदेव थे। ऋषि दमन के आशीर्वाद से उनके यहाँ तीन पुत्र और एक पुत्री का जन्म हुआ। पुत्रों के नाम दम, दन्त और दमन थे। पुत्री का नाम था दमयंती। राजकुमारी दमयंती अपनी सुंदरता के लिए सारे देश में प्रसिद्ध थी। उसके रूप् और गुणों की चर्चा सुन-सुनकर कई देशों के राजा उसे अपनी रानी बनाना चाहते थे।
राजा नल भी उससे गहरा प्रेम करने लगे थे। कभी-कभी वे राजकुमारी दमयंती को याद कर बेचैन हो जाया करते थे। एक दिन मन बहलाने के लिए वे एक सुंदर बगीचे में रथ पर सवार होकर जा पहुँचे। चारों ओर प्रकृति की सुंदरता बिखरी हुई थी। हरे-भरे वृक्ष और लताएँ धीमी-धीमी हवा में झूम रहे थे। रंग-बिरंगे फूलों की सुवास वातावरण में भरी थी। धूप चाँदनी जैसा सुख दे रही थी। पक्षी कलरव कर रहे थे और कोयलें मीठा गाना गा रही थीं। पर दमयंती की कल्पना में डूबे नल को कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था।
वहाँ एक सुंदर जलाशय भी था, जिसमें कई रंगों के सुन्दर कमल खिले थे। तभी राजहंसों का एक दल वहाँ आकर उतरा। राजा नल कुछ समय उनकी सुंदरता देखते रहे। फिर उनका मन एक हंस को पकड़ने के लिए मचल उठा। उन्होंने देखा सबसे सुंदर एक हंस अपने सुनहरे पंखों में मुँह छुपाकर सो रहा था। राजा नल चुपके से उस सुंदर हंस की ओर बढ़े और पास पहुँचकर उसे पकड़ लिया। हंस छुटकारे के लिए खूब फड़फड़ाया पर उसका कोई वश न चला। तब वह मनुष्य वाणी में राजा से बोला, ‘हे राजन्, आप बहुत वैभवशाली हैं। फिर भी आपको मेरे सुनहरे पंखों का लोभ है। पर मेरे पंखों से न आपका कोश भरेगा, न आपके यश में वृद्धि होगी। मुझे मारने से पहले आपको मेरे बूढ़े माता-पिता, युवा पत्नी और छोटे बच्चों की दशा पर विचार करना चाहिए। मेरे मर जाने पर उनका पालन-पोषण कौन करेगा ?’
फिर हंस अपनी मृत्यु का सोच विलाप कर उठा, ‘हे विधाता, कमल नाल से पैदा होने पर भी तुम कितने कठोर हो ! अपने कोमल हाथों से तुमने मेरी सुंदर पत्नी को तो रच दिया, पर उन्हीं हाथों से उसके भाग्य में विधवा होना कैसे लिख दिया ? मेरे नन्हे बच्चों की तो अभी आँखें भी नहीं खुलीं। भूखे-प्यासे वे मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। यदि समय पर उन्हें भोजन न मिला तो वे चूं-चूं करते हुए मर जायेंगे।’ ऐसा करुण विलाप करते हुए हंस बेहोश हो गया।
दयावान राजा नल को हंस पकड़ने पर बड़ा पछतावा हुआ। दया के कारण उनकी आँखों में आँसू छलछला पड़े। आँसू की कुछ बूँदे हंस के सिर पर गिरीं तो हंस को होश आ गया। राजा ने उसे छोड़ दिया। वह खुश होकर अपने साथियों में जा मिला। उसके संगी-साथी भी उसे अपने बीच पाकर चहकने लगे। कुछ क्षणों बाद वह हंस अपने दल में से उड़कर राजा के पास आकर बैठ गया।फिर मीठे स्वर में बोला, ‘राजन्, आप जितने सुंदर हैं उतने ही उदार और दयावान भी हैं। आपने मुझे छोड़कर बड़ा उपकार किया है। मैं आपका आभारी हूँ। मैं आपका कोई प्रिय कार्य करना चाहता हूँ। आप कहें तो मैं विदर्भ की राजकुमारी दमयंती के पास जा सकता हूँ। वह साक्षात् लक्ष्मी के समान सुंदर हैं, सुलक्षणा हैं। वह आपकी ही रानी बनने योग्य हैं। मैं उनके पास जाकर आपकी प्रशंसा उन्हें सुनाऊंगा।’
हंस से अपने मन की बात सुनकर राजा नल प्रसन्न हो उठे। प्यार से उसे सहलाते हुए बोले, ‘प्रिय हंस, तुम्हारा शरीर ही सोने का नहीं है, बातों में भी तुम बड़े चतुर हो। दमयंती के रूप और गुणों का वर्णन कर तुमने उसे मेरे सामने साकार कर दिया है। उसके बिना मुझे यह सुवास भरी हवा, सुखदायी चंद्रमा, सुंदर फूल, हरा भरा वन कुछ भी अच्छे नहीं लग रहे हैं। यदि तुम मुझे दमयंती से मिलवाने में सहायता कर सको तो मैं तुम्हारा उपकार मानूँगा। जाओ, तुम्हारा मार्ग मंगलमय हो।’
राजा नल से विदा लेकर हंस विदर्भ राज्य की राजधानी कुंडनपुर पहुँचा। कुंडनपुर बड़ा सुंदर नगर था। ऊँचे-ऊँचे भवन, साफ-सुथरी सड़कें और खूबसूरत बाग-बगीचे नगर की शोभा बढ़ा रहे थे। साफ जल से भरे सरोवरों में कमल खिल रहे थे। फल-फूलों से लदे वृक्ष और पौधे आँखों को सुख देते थे। उन सबकी शोभा देखता हुआ हंस दमयंती के उपवन में जा उतरा।
उस सोने से दमकते सुंदर हंस को देखकर दमयंती उसे पकड़ने के लिए धीमे-धीमे उसकी ओर बढ़ी। पर जैसे ही दमयंती हंस को पकड़ने लपकी, त्यों ही हंस उड़कर और दूर जा बैठा। दमयंती भी दबे पाँव उसका पीछा करते हुए वहाँ जा पहुँची। पर फिर हंस उड़कर लताओं से घिरे एक कुंज में जा बैठा। दमयंती भी दौड़कर वहाँ जा पहुँची। वह बुरी तरह थक चुकी थी।
दमयंती को थका हुआ जानकर हंस बोला, ‘राजकुमारी, युवा हो जाने पर भी तुम्हारा बचपना अभी गया नहीं। तुम कितना भी चाहो पर मुझे पकड़ न पाओगी। हम देवताओं के पक्षी हैं। देवों की अनुमति से हम महाराज नल का अदभुत सरोवर देखने धरती पर उतरे हैं। सुंदरता में महाराज नल कामदेव के पर्याय हैं। उनका सौंदर्य देखकर स्वर्ग की अप्सराएँ भी उन्हें पाने के लिए ललचा रही हैं। वैभव और गुणों के अपार भंडार राजा नल का यश सारा संसार जानता है। वे सब तरह से तुम्हारे योग्य वर हैं।’
हंस से मनभावन बातें सुनकर दमयंती बोली, ‘हंस, बालसुलभ चंचलता के कारण मैंने तुम्हें पकड़ने का यत्न किया था। तुम्हें जो कष्ट हुआ, उसके लिए मुझे क्षमा कर दो। मैं कन्या होकर अपने विवाह की बात खुद कैसे कर सकती हूँ। पर मैंने यह निश्चय कर लिया है कि राजा नल के सिवाय किसी दूसरे से विवाह नहीं करूंगी। तुम राजा नल को मुझसे विवाह करने के लिए तैयार कर दो। मैं तुम्हारा गुण जीवन भर गाऊंगी।’
हंस समझ गया कि दमयंती भी राजा नल से गहरा प्रेम करती है। उन्हें ही वर के रूप में पाना चाहती है। वह बोला, ‘हे राजकुमारी, जैसे तुम राजा नल से प्रेम करती हो वैसे ही राजा नल तुम्हें चाहते हैं। तुम्हारी मनोकामना पूरी हो और तुम दोनों सदा सुखी रहो। अब मैं राजा नल के पास जाकर तुम्हारे हृदय के भाव कहूँगा।’ यह कहकर हंस वहाँ से उड़ गया।
उधर राजा नल बेचैनी से हंस का इंतजार कर रहे थे। हंस के वहाँ पहुँचते ही वे उतावले हो दमयंती के विषय में बातें करने लगे। हंस भी उत्साह के साथ दमयंती की बातें उन्हें बताता रहा। हंस के चले जाने के बाद दमयंती राजा नल के लिए बेचैन रहने लगी। उसका हँसना-खेलना बंद हो गया। वह उदास होकर उन्हीं के विचारों में खोई रहती। कभी-कभी प्रलाप भी करने लगती। पिता राजा भीमदेव अपनी युवा पुत्री की दशा देख चिंता में डूबने लगे। अच्छे से अच्छे वैद्यों से दमयंती की दवा करवाई गई, पर शरीर का रोग हो तो मिटे, मन का रोग वैद्यों की दवा से कैसे दूर होता ? दमयंती की माँ की सलाह पर राजा भीम ने दमयंती के स्वयंवर की घोषणा कर दी। सभी देशों के राजकुमारों को बुलावा भेजा गया। अतुल रूपवती और गुणवती दमयंती को पाने के लिए देवता भी लालायित थे। अतः स्वयंवर का समाचार सुन देवराज इंद्र, अग्नि, जल के देवता वरुण और मृत्यु के देवता यम भी सज-धजकर विदर्भ की राजधानी कुंडनपुर की ओर चले। देवराज इंद्र ने तो दमयंती पर असर डालने के लिए अपनी दूतियाँ भी गुप्त रूप से दमयंती के पास भेजीं। महाराज भीमदेव को बहुत कीमती-कीमती उपहार भी भिजवाये।
रास्ते में देवताओं की भेंट राजा नल से हो गई। उनके अनुपम स्वरूप को देखकर दूसरे सारे दवता निराश हो गए। भला नल के होते हुए दमयंती उन्हें क्यों अपना पति बनायेगी ? दमदमाता हीरा छोड़कर भला कौन मूर्ख काँच के गुरियों को गले में पहनेगा ? पर चतुर इंद्र ने आशा न छोड़ी। वह बड़ी विनय से राजा नल से बोले, ‘राजन्, कृपा करके आप मेरा एक काम कर दीजिए।’
‘आदेश दीजिए, देवराज। आपका प्रिय कार्य मैं अवश्य पूरा करूँगा।’ मीठे स्वर में राजा नल ने वचन दिया।
कपट भाव से भरे इंद्र ने कहा, ‘आप हमारे दूत बनकर राजकुमारी दमयंती के पास जाइये। उनसे हम देवताओं में से किसी एक का वरण करने के लिए राजी कीजिये।’ राजा नल को देवताओं से ऐसे प्रस्ताव की आशा न थी। मन ही मन उन्हें बुरा लगा, पर वह वचन दे चुके थे। उन्होंने देवराज से अदृश्य होने की शक्ति प्राप्त की और दमयंती के महल में जा पहुँचे।
दमयंती उस समय अपनी माँ से भेंट कर रही थी। इंद्र द्वारा भेजी दूतियाँ भी वहीं उपस्थित थीं। वे चारों देवताओं में से किसी एक को अपना पति चुनने के लिए दमयंती को समझा रही थीं। एक-एक देवता के रूप, शक्ति और गुणों को बढ़ा-चढ़ाकर बता रही थीं। पर दमयंती पर कोई असर न हो रहा था। वह अपने चेहरे पर चिढ़ का भाव लिए उनकी बातें सुन रही थी। जब दूतियों द्वारा देवताओं का बखान पूरा हो चुका तो दमयंती ने साफ शब्दों में कह दिया कि वह राजा नल को ही अपना पति चुनेगी। किसी दूसरे को पति बनाने का वह सोच भी नहीं सकती। दमयंती का ऐसा निश्चय सुनकर दूतियाँ निराश होकर वहाँ से चली गईं। दमयंती की माता भी अपने महल में वापस चली गईं।
अदृष्य नल दूतियों और दमयंती की बातचीत सुन रहे थे। जब दमयंती का उत्तर उन्होंने सुना तो उन्हें अपार प्रसन्नता हुई। बहुत देर तक वह दमयंती का सुंदर चेहरा निहारते रहे। फिर प्रकट होकर उसके सामने खड़े हो गए। एक तेजस्वी और रूपवान पुरुष को एकाएक सामने खड़ा देख दमयंती और उसकी सखियाँ हड़बड़ा गईं। क्षण भर बाद वे अपना आसन छोड़कर नल को अचम्भे में भरकर देखने लगीं उनके अनुपम स्वरूप को देखकर दमयंती की आँखों में अनुराग उमड़ आया। उसे ऐसा लगा कि सामने खड़ा पुरुष राजा नल ही हैं। यह महसूस कर दमयंती ने राजा नल का उचित सत्कार किया। फिर उनसे परिचय पूछा। राजा नल बोले, ‘हे राजकुमारी, इस समय मेरा परिचय यही है कि मैं देवराज इंद्र, अग्नि, अरुण और यमराज का भेजा हुआ दूत हूँ। ये सभी देवता आपसे गहरा प्रेम करते हैं, इसलिए उनमें से किसी एक को वरण कर उन्हें अपना पति बना लीजिए।’
नल की बातें सुनकर दमयंती ने कहा, ‘मैंने आपका परिचय पूछा था, पर आप देवताओं का पक्ष लेने को कह रहे हैं। ये बेकार की बातें छोड़कर मुझे अपना नाम और कुल के बारे में बताइये।’
मन ही मन प्रसन्न होते हुए नल बोले, ‘राजकुमारी, दूत का नाम और कुल पूछकर आप क्या करेंगी ? आप देवताओं के संदेश का उत्तर देने की कृपा कीजिए।’
यह सुनकर दमयंती ने का, ‘बिना आपका परिचय जाने देवताओं के प्रस्ताव का उत्तर नहीं मिलेगा।’
अब नल क्या करें, यदि वे सही परिचय देते हैं तो बात बनेगी नहीं। इसलिए उन्होंने अपना झूठा परिचय दमयंती को दिया। उसे सुनकर दमयंती बोली, ‘आपने अपना कर्तव्य कर दिया। अब मेरा उत्तर देवताओं तक पहुँचा दीजिए। मैंने राजा नल को अपना पति चुन लिया है। अब साक्षात् भगवान विष्णु का भी मैं वरण नहीं कर सकती। देवताओं को मुझे पाने का विचार त्याग देना चाहिए। यदि उन्होंने कपट और ताकत के बल पर नल को मुझसे छीना तो मैं आत्महत्या कर लूंगी। मेरे इस पक्के निश्चय को आप देवताओं को बता दें।’
राजा नल ने दमयंती के विचारों को गहराई से जानने के लिए कहा, ‘राजकुमारी तुम बड़ी भोली हो। देवराज इंद्र को छोड़कर साधारण मनुष्य नल को वरण करने का तुम्हारा हठ वैसा ही है जैसे ऊँट मीठे गनने को छोड़कर काँटेदार झाड़ी की ओर लपकता है। आत्महत्या करके भी तुम स्वर्ग में इंद्र के ही पास पहुँचोगी। वहाँ कल्पवृक्ष से इंद्र तुम्हें माँग लेंगे। आग में जलोगी तो अग्नि देव तुम्हें पा लेंगे। पानी में डूबने पर वरुण के पास अपने आप पहुँच जाओगी। यम तुम्हें अगस्त्य से माँग लेंगे। फिर देवताओं को नाराज करने से मंगल नहीं होता। यदि अग्नि देव रूठ गए तो नल से विवाह के समय वह प्रगट नहीं होंगे। बिना अग्नि की साक्षी के विवाह कैसे होगा ? यदि यमराज का कोप वर या वधू, किसी पर भी हो गया तो विवाह कैसे होगा ? वरुण के रूठने पर तुम्हारे पिता बिना जल के तुम्हारा दान कैसे कर सकेंगे इसलिए अच्छा होगा कि तुम किसी एक देवता को पति स्वीकार कर लो।’
राजा नल से ऐसे तर्क सुनकर दमयंती रो पड़ी। आँसू बहाती हुई बोली, ‘हे भगवान, बिना नल के मैं जीवित नहीं रहना चाहती। मर जाने पर किसी से वैर नहीं रहेगा। हे पवन, कृपा कर मेरी चिता की भस्म को निषध देश के राजा नल के पास पहुँचा देना। तब मेरा जीवन सफल हो जायेगा। हे देवताओं, मेरा विचार छोड़ दो। आप लोग अपनी ताकत से मुझ जैसी अनेक युवतियाँ पैदा कर सकते हैं।
हे प्राणों के आधार, दूर रहने से तुम मेरी दशा नहीं जानते। वह प्यारा हंस भी पास नहीं है, नहीं तो वह मेरी दुखभरी कथा तुम्हें सुनाता। तब तुम अवश्य मुझे संकट से उबार लेते। पर यह दुख मेरे भाग्य का ही फल है। तुम मेरे जीवन हो। इस जन्म में तो मैं तुम्हें नहीं पा सकी, पर अगले जन्मों में तुम्हें ही पति रूप में पाती रहूँ, यही मेरी अंतिम कामना है।’ कहते-कहते दमयंती फफक-फफक कर रो पड़ी।
अपनी प्रियतमा को करुण विलाप करते देख राजा नल से रहा न गया। उनकी आँखों में भी आँसू छलछला आए। भरे दिल से वह बोले, ‘राजकुमारी धीरज धरो। मैं ही वह निष्ठुर नल हूँ जिसके कारण तुम्हें इतना कष्ट सहन करना पड़ रहा है। कर्त्तव्य से बँधे होने के कारण मुझे वह सब कहना पड़ा जिससे तुम्हारे कोमल हृदय को पीछ़ा पहुँची। तुम सदा मेरे मन में विराजमान रहोगी। इसलिए रोना बंद कर प्रसन्न हो।’ फिर नल ने मन ही मन में देवताओं से क्षमा माँगी।
तभी वह सुनहला हंस वहाँ आ पहुँचा। उसने महाराज नल से कहा, ‘महाराज, आप दमयंती को बिना किसी भय के स्वीकार करें। दमयंती सब तरह से आपकी महारानी बनने योग्य है।’
हंस की बात सुनकर राजा नल दमयंती से बोले, ‘शायद देवतागण मुझसे अप्रसन्न होंगे, पर अब तुम्हें अधिक दुख न दूँगा।’
महाराज नल के इस तरह प्रकट होने पर दमयंती लजा गई। मन ही मन वह बहुत प्रसन्न हुई। उसका चेहरा खुशी से दमकने लगा। उसके शरीर में फुरफुरी हो आई। पर वह यह सोचकर सकुचा भी उठी कि पता नहीं महाराजा नल उसके बारे में क्या सोचते होंगे।
दमयंती को लजाते देख उसकी सखी नल से बोली, ‘राजन्, मेरी सखी आपके बिना जीवित न रहेगी। आप भरोसा देकर जाइये कि आप स्वयंवर में अवश्य पधारेंगे।’ राजा नल ने स्वयंवर में आने का वचन दिया। फिर वह वहाँ से चल दिये।
राजा नल ने उन चारों देवताओं को दमयंती से हुई बातचीत ज्यों की त्यों सुना दी। देवतागण दमयंती का निश्चय सुन निराश हुए, पर नल की कर्त्तव्य भावना और सच बोलने पर प्रसन्न भी हुए।
स्वयंवर के लिए संसार भर से राजकुमारों का ताँता राजधानी कुंडनपुर में लग गया। देवताओं और मनुष्यों के साथ ही पाताल लोक से नागराज वासुकि भी विवाह की इच्छा लेकर पधारे थे। राजा भीमदेव ने सबका यथोचित स्वागत कर हर एक को उनकी प्रतिष्ठानुसार विभिन्न स्थानों पर ठहराया। उनकी सुख-सुविधा का बढि़या प्रबंध किया।
देवतागण सुन चुके थे कि राजकुमारी दमयंती नल के सिवा किसी दूसरे का वरण नहीं करेगी इसलिए उन्होंने कपट से काम लेने की योजना रची। चारों देवताओं ने अपनी शक्ति से नल का रूप धारण कर लिया। उन्होंने सोचा कि दमयंती हम सब में से किसी एक को नल समझकर वरमाला पहना देगी। ऐसी कल्पना कर नल बने वे चारों देवता स्वयंवर स्थल पर जा विराजे। अनेक सुंदर और प्रसिद्ध राजाओं के साथ पाँच नल वहाँ दिखे तो सभी विस्मित हो गए। ऐसा कौतुक देखने बड़ी भीड़ जुटी। सभी यह देखना चाहते थे कि दमयंती किस नल को वर के रूप में चुनती है। स्वयं भगवान विष्णु अन्य देवताओं और मुनियों के साथ यह तमाशा देखने आकाश में आ विराजे।
जिस भवन में स्वयंवर हो रहा था वह बहुत सुंदर बना था। फिर उसे बड़ी निपुणता से सजाया गया था। उसकी सजावट मनभावन और आँखों को भली लगने वाली थी। लोग उसकी खूब सराहना कर रहे थे। एक से बढ़कर सैकड़ों राजा, राजकुमार और देवता सिंहासनों पर विराजमान थे। उनका ठीक-ठीक परिचय कैसे दिया जाये, परिचय कौन दे, यह चिंता राजा भीमदेव को सता रही थी। उन्होंने इस संकट से बचने के लिए भगवान से प्रार्थना की। उनकी विनय पर भगवान ने देवी सरस्वती को राजा भीम के पास भेज दिया।
अब स्वयंवर आरंभ हुआ। शुभ मुहूर्त में हाथों में वरमाला लिए दमयंती ने भवन में प्रवेश किया। वह सकुचा रही थी। वधू के वेश में उसकी अनुपम सुंदरता दुगुनी हो गई थी। अगणित आँखें उसके अपार रूप को देखकर ठगी रह गईं। सबने सोचा कि इस संसार में तो ऐसी सुंदरता कभी दिखाई नहीं दी, विधाता ने दमयंती की रचना शायद सुंदरता के राजा कामदेव के लिए की होगी।
सरस्वती के साथ लाज के भार से दबी दमयंती धीमे-धीमे कदम रखती हुई देवताओं, विद्याधरों, गंधर्वों, यक्षों तथा राक्षसों के सामने से होती हुई नागराज वासुकि के सामने पहुँची। देवी सरस्वती ने उनकी महानता का बखान आरंभ किया। पर दमयंती पर उसका कोई प्रभाव न पड़ा। तब देवी सरस्वती उसे अनेक देशों के राजाओं के सामने ले गईं। हर राजा के रूप, गुण, कुल ओर ताकत का विस्तार से वर्णन दिया, पर दमयंती ने किसी में भी थोड़ी-सी रुचि भी नहीं दिखाई। आगे नल का वेश धरे चारों देवता और स्वयं नल विराजमान थे। नल को देखकर दमयंती आनंद से भर उठी। पर दूसरे ही क्षण पाँच नल देख आश्चर्य में डूब गई। दमयंती समझ गई कि देवतागण उसे धोखे में डालकर उसको पाना चाहते हैं। वह सोच में पड़ गई। जब उसे कोई उपाय न सूझा तो उन्हीं देवताओं से मनुष्य नल को पहचानने की शक्ति देने की प्रार्थना की।
राजकुमारी दमयंती द्वारा सच्चे और भोले मन से की गई प्रार्थना पर देवतागण पिघल गये। उन्होंने दमयंती के मन को सुझाया कि देवताओं की आँखों के पलक नहीं झपकते। देवताओं के पैर भूमि को छूते नहीं हैं। उन पर धूल-पसीना नहीं आता। उनकी छाया भी नहीं पड़ती। इन अंतरों को जानकर दमयंती असली नल को पहचानने में सफल हुई। उसने देवताओं का उपकार माना। उन्हें मन ही मन प्रणाम किया। फिर महुए के फूलों से गुँथी वरमाला उसने राजा नल के गले में डाल दी।
सारा उपस्थित जन समूह हर्ष से भर उठा। ‘राजकुमारी दमयंती चिर-सौभाग्यवती हो’ कहकर सभी बड़े-बूढ़ों ने आशीर्वाद दिया। चारों देवताओं ने भी अपने असली रूपों में प्रकट हो प्रसन्न मन से नव दंपति को आशीर्वाद दिया। देवताओं ने राजा नल से कहा, ‘राजन्, आप बिना कपट भाव के हमारे दूत बने थे। उससे हम आप पर प्रसन्न हैं। हम आपके द्वारा किये यज्ञों में सशरीर आया करेंगे। अपने शत्रुओं पर आपकी सदा विजय होगी। जहाँ भी आप चाहेंगे वहाँ जल और अग्नि प्रकट हो जाया करेगी। आपके गले की पुष्प माला के फूल कभी मुरझायेंगे नहीं। उन फूलों से दिव्य सुगंध निकला करेगी।’ ऐसा आशीर्वाद देकर देवतागण फिर दमयंती से बोले, ‘हे दमयंती, हम तुम्हारी पवित्र भावना से बहुत प्रसन्न हैं। हम तुम्हें वरदान देते हैं कि जो कोई बुरी भावना से तुम्हारे शरीर को छुएगा, वह भस्म हो जायेगा।’ देवी सरस्वती ने भी नल को चिंतामणि नामका मंत्र दिया। उस मंत्र की शक्ति से नल की हर मनोकामना दूर हो जायेगी। ऐसा आशीर्वाद और उपहार देकर देवतागण स्वर्ग चले गए।
सभी जानेवाले लोगों को आदर सहित विदा कर राजा भीमदेव ने विवाह की तैयारी करने का आदेश दिया।
राजमहल में विवाह की तैयारियाँ होने लगीं। तरह-तरह के पकवान और मिठाइयाँ बनने लगीं। मणियों और मोतियों के वंदनवारों से सारी नगरी सजायी गई। कलाकारों ने सुंदर चित्रों को दीवारों पर बनाया। हर दरवाजे पर कलश सजाए गए। केलों के खंभे और आम के पत्तों से सजे घर अनोखी शोभा दे रहे थे। तरह-तरह के बाजे मधुर स्वरों में बजाये जाने लगे। सभी नर-नारी, बालक खुशी से भरे सुंदर कपड़ों में सजे विवाह की बाट देख रहे थे। राजकुमारी दमयंती का दुल्हन के रूप में अनोखा श्रृंगार किया गया। उसका श्रृंगार ऐसा हुआ जिसका वर्णन करना कठिन है। इसके बाद दमयंती ने अपने माता-पिता, गुरुजनों और बड़ी-बूढ़ी स्त्रियों को प्रणाम कर अचल सुहाग का आशीर्वाद लिया।
राजा नल वर के रूप में सजे रथ पर सवार हो बारात के साथ महल की ओर बढ़ने लगे। सड़कों और अटारियों पर दूल्हा बने नल को देखने के लिए अपार भीड़ जुटी। जो उन्हें देखता वही खुशी से भर उठता। उन पर छज्जों से नारियाँ फूल और धान की लाई बरसा रही थीं। उन जैसा वर देखकर नारियाँ दमयंती के भाग्य की सराहना करते न थक रही थीं।
महल के दरवाजे पर बारात के आगमन पर कुमार दम ने आगे बढ़कर सबका यथोचित स्वागत-सत्कार किया। कुछ क्षणों बाद शुभ लग्न में नल-दमयंती का विवाह संस्कार हुआ। नल और दमयंती ने शास्त्र की आज्ञानुसार कौतुक गृह में ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए तीन दिन बिताये।
कुछ दिनों ससुराल में रहकर राजा नल रानी दमयंती को विदा कर अपनी राजधानी जाने को तैयार हुए। राजा भीम और उनकी महारानी को अपने गुणवान दामाद और प्यार से बड़ी इकलौती पुत्री के बिछोह का बड़ा दुःख हुआ, पर परम्परा के आगे उन्हें झुक कर अपनी बेटी को विदा करना ही पड़ा। बेटी की विदाई पर न केवल महल में वरन् पूरे नगर में उदासी छा गई। सैकड़ों नर-नारी और दमयंती के माता-पिता, सहेलियाँ आँखों में आँसू भर उसे विदा करने नगर की सीमा तक आये। दमयंती के माता-पिता ने रोते हुए उसे गले लगाया और बोले, ‘बेटी, अब ससुराल में पुण्य ही तुम्हारा पिता और क्षमा ही माता है। लोभहीनता ही तुम्हारा धन और पति नल ही सब कुछ है। अपने कर्तव्यों के पालन में सजग रहना। अपने मीठे स्वभाव से सबको प्रसन्न रखना।’ ऐसा कहकर अपनी छाती पर पत्थर रख आँसू भरी आँखों से सबने दमयंती को विदा किया।
राजा नल के रानी दमयंती सहित आने का शुभ समाचार निषध की राजधानी में पहले ही पहुँच चुका था। आकाश को छूने वाले भवनों से भरी वह नगरी खूब सजाई गई। खुशी से भरे नागरिक मीठे सवरों में बाजे बजा-बजाकर सड़कों पर नाच-गा रहे थे। राजा नल के नगर प्रवेश पर उनका बड़े उललास से सवागत हुआ। प्रसन्न मन से रानी दमयंती सहित राजा नल ने अपने महल में प्रवेश किया।
उधर जब देवतागण स्वर्ग लौट रहे थे, तब द्वापर के साथ कलियुग से उनकी भेंट हुई। कलियुग दमयंती के स्वयंवर में जा रहा था, पर उसे देर हो गई थी। इंद्र ने बताया कि स्वयंवर तो समाप्त हो चुका है और दमयंती ने नल का वरण किया है। अब वहाँ जाना बेकार है। यह सुनकर कलियुग को राजा नल पर बड़ा क्रोध आया। उसने नल से बदला लेने की ठानी। उसने तय किया कि वह किसी भी तरह नल को निषध राज्य और दमयंती से अलग कर देगा। उन्हें तरह-तरह से अपमानित करेगा और कष्ट पहुँचायेगा।
कलियुग के इस हठ को सुनकर देवराज इंद्र को बुरा लगा। उन्होंने नल की तारीफ की और कलियुग को समझाया, पर दुष्ट स्वभाव का कलियुग इंद्र का ही मजाक उड़ाने लगा। यह असभ्य और दुष्ट स्वभाव का कलियुग मानने वाला नहीं, यह सोचकर इंद्र वापस स्वर्ग लौट गये।
कलियुग राजा नल से बदला लेने के लिए निषध की राजधानी की ओर चल दिया। उसने कई तरह से नल ओर दमयंती को सताने के यत्न किए, पर अपनी चतुराई और सदवृत्ति के कारण वे बचते रहे। कलियुग की उनकी सामने एक न चली। हारकर वह नगर के बाहर खड़े पुराने बहेड़े के पेड़ पर रहने लगा और अनुकूल अवसर की प्रतीक्षा करता रहा। परन्तु कलियुग को कई वर्षों तक कोई अवसर न मिला। राजा नल और रानी दमयंती धर्म का आचरण और प्रजा की भलाई करते हुए सुखपूर्वक जीवन बिताते रहे।

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

हरिकृष्ण तैलंग : व्यक्तित्व और कृतित्व परिचय

हरिकृष्ण तैलंग : व्यक्तित्व और कृतित्व परिचय


27 दिसंबर 1934 को राजा बिलहरा (सागर) में वहाँ के प्रकांड संस्कृतज्ञ पंडित मुरलीधर तैलंग के बड़े पुत्र हरिकृष्ण तैलंग ने युवावस्था में ही बतौर बाल साहित्यकार अपनी देशव्यापी पहचान गढ़ ली थी। उनकी माँ का नाम लक्ष्मीबाई था। उनके तीन छोटे भाई सुरेंद्र, देवेंद्र और रवीन्द्र हैं। आकाशवाणी में कार्यरत रवीन्द्र तैलंग का असामयिक निधन हो चूका था। शारदा, शशि, इंदु, सिंधु और संतोष नामक पाँच बहनों में सिर्फ एक बहन श्रीमती इंदुप्रभा वर्तमान में भोपाल की मंदाकिनी कालोनी में अपने पुत्र प्रवीण और राकेश के साथ निवासरत हैं। उनके परिवार में उनकी पत्नी श्रीमती सुमन, जो खुद एक शिक्षक रहीं और भोपाल के राजा भोज हायर सेकंडरी स्कूल से रिटायर्ड हुईं, पुत्र अभिनव, पुत्रवधु साधना, पौत्र पर्व, पौत्री पूर्वी एवं बड़ी पुत्री नंदा, दामाद अशोक व्यास, नाती उत्सव तथा छोटी पुत्री प्रज्ञा, दामाद एच. प्रकाश भट्ट, नाती प्रवेश, नातिन प्राची शामिल हैं। 
हरिकृष्ण तैलंग ने किशोरावस्था तक अपने चाचाओं के घर रहकर स्कूली शिक्षा कई नगर-कस्बों - भंडारा, नागपुर, गोंदिया, सागर आदि में रहकर की। तीसरी कक्षा तक वे अपने मूल गाँव राजा बिलहरा में पढ़े। फिर महाराष्ट्र के भंडारा में और नागपुर के तुलसी हिंदी प्रायमरी स्कूल में चौथी कक्षा पास की। पाँचवी कक्षा के लिए उनका एडमिशन जबलपुर के हितकारिणी हाई स्कूल में हुआ। गोंदिया में रहकर छठी कक्षा की पढ़ाई की और सातवीं कक्षा के लिए सागर के कटरा मुहल्ले में स्थित म्युनिसिपल हाई स्कूल पहुँचे। वहाँ उन्होंने 11वीं यानी तब की हायर सेकेंडरी परीक्षा पास कर तब के प्रतिष्ठित "सागर विश्वविद्यालय" से बी.काॅम. और फिर एम.ए. (हिंदी) और बी.एड् किया। यूनिवर्सिटी में पढ़ते समय सागर में ही उनकी नौकरी रजिस्ट्रार कार्यालय में लग गई, पर वहाँ की कार्यप्रणाली उन्हें रास न आई। जमीन-जायदाद की रजिस्ट्री आदि में जो बंदरबाँट-काला पीला होता है, उसके लिए उनका स्वभाव अनुकूल न था। बाद में उनके ससुर नूतनकुमार तैलंग, जो तब जिला शिक्षाधिकारी थे और विलनीकरण आंदोलन में शंकरदयाल शर्मा के सक्रिय सहयोगी भी थे, के कहने पर 1955 में स्कूली शिक्षा विभाग में अपर ग्रेड टीचर की नौकरी प्रारंभ की। अध्यापन कर्म की शुरुआत उन्होंने भोपाल के "जहाँगीरिया हायर सेकेंडरी स्कूल" से की। ईमानदारी, कर्मठता और साफगोई के परिणामस्वरूप उनका तबादला कई जगहों जैसे रायपुर, हरदा, नरसिंहपुर, विदिशा, बैरसिया आदि में हुआ पर उन्होंने जोड़तोड़ कर कभी तबादला रुकवाने की कोशिश करने की बजाय समर्पण भाव से अध्यापन और  कर लेखन करना पसंद किया। 32 वर्ष अध्यापन करने के पश्चात  उन्होंने 1987 में स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ली। तब वे बेरसिया के एक गाँव अर्रावती में बतौर हेड मास्टर कार्यरत थे। वहाँ उन्होंने न सिर्फ बच्चों और शिक्षकों में रोचक तरीके से शिक्षण करने का गुर सिखाया बल्कि वृक्षारोपण, साफ-सफाई, समाज सेवा आदि की प्रेरणा भी दी। एक हनुमान मंदिर की स्थापना में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वालेंटियर रिटायरमेंट के बाद वे घर नहीं बैठे, बल्कि लेखन से जुड़े पत्रकारिता क्षेत्र में शामिल हो अपनी महत्वपूर्ण जगह बना ली। वे ‘राज्यश्री’, ‘समझ झरोखा’ (वन्या प्रकाशन मप्र शासन उपक्रम), ‘दैनिक जागरण", भोपाल में लगभग 12 वर्ष वरिष्ठ सहयोगी संपादक रहे। ‘दैनिक जागरण’ में उनके अनगिनत संपादकीय को सुधी पाठक आज भी याद करते हैं। 
बाल साहित्‍य में श्री हरिकृष्ण तैलंग ऐसा चिर परिचित नाम रहा है, जिन्होंने हमेशा बाल साहित्‍य के विकास, उसकी सम्मानीय स्थापना हेतु उत्कृष्ट कार्य किया। बच्चों और किशोर पाठकों के लिए उन्होंने आधुनिक बोध से सम्पन्न बाल कहानियाँ, वैज्ञानिक चेतना से ओत-प्रोत साहित्य रचा ताकि बाल साहित्य में परंपरागत राजा-रानी और परी लोक से इतर तर्कपूर्ण और जानकारीप्रद रचनाएँ लिखी जाएँ। आरंभिक दशक में ही साहित्यिक जगत में उनका सम्मानजनक स्थान बन गया, साथ ही युवाओं को भी प्रोत्‍साहित, प्रेरित करते रहे। उन्होंने न सिर्फ उत्कृष्ट बाल साहित्‍य का सृजन किया,वरन अन्य विधाओं में भी अपनी उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज़ की। वे सहज, सरल, मिलनसार और मददगार इन्सान भी थे। हरिकृष्ण तैलंग ने लगभग 20 वर्ष की उम्र में लेखन प्रारंभ किया और अपने मृत्य दिवस, हिंदी दिवस 14 सितंबर 2014 तक जारी रहा। उनकी आखिरी दो पुस्तकें ‘नाम एक नगर अनेक’ और ‘नाम एक व्यक्ति अनेक’ प्रकाशनाधीन हैं। रोचक शैली में लिखीं इन ज्ञानवर्धक पुस्तकों में ऐसे नामचीन शहरों और प्रख्यात व्यक्तियों का परिचय है जो एक नाम के हैं पर अपनी स्वतंत्र पहचान रखते हैं। उदाहरणार्थ ताजमहल न सिर्फ आगरा में है बल्कि देश-विदेश के कई दूसरे शहरों में भी हैं। मुंबई का प्रख्यात होटल ताज हो या भोपाल की ऐतिहासिक इमारत ताजमहल, सभी को श्री तैलंग ने शामिल किया है। इसी तरह अशोक नामक हस्तियों में सम्राट अशोक के साथ वर्तमान समय के राजनेता अशोक गहलोत और कालजयी अभिनेता अशोक कुमार और कवि अशोक वाजपेयी के साथ ही उदघोषक अशोक वाजपेयी के बारे में भी पर्याप्त जानकारी संग्रहित की। 
लेखन के प्रारंभिक वर्ष, सन् 1954 से ही देश की प्रतिष्ठित और बहु-प्रसारित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाओं का प्रकाशन होने लगा था। मात्र 27 वर्ष की युवावस्था में 1961 में ‘पराग’ के खिलौना विशेषांक में उनकी कहानी ‘गुडि़या का विवाह’ पर मुखपृष्ठ बना तथा टाइम्स आॅफ इंडिया ग्रुप की पत्र-पत्रिकाओं में उस विशेषांक का विज्ञापन भी उसी कहानी पर आधारित था। बालसखा, नंदन, बालभारती, बालहंस, समझ झरोखा, चकमक आदि में भी बालकों के लिए कहानियाँ प्रकाशित हुईं। धर्मयुग, सारिका, दिनमान, साप्ताहिक हिंदुस्तान, कादम्बिनी, नवनीत, समाज कल्याण, कथालोक, हिमप्रस्थ, शिखरवार्ता, पालिका समाचार, भारती, मध्यप्रदेश संदेश, साक्षात्कार, नवभारत टाइम्स, दैनिक हिंदुस्तान, जनसत्ता, पंजाब केसरी, अमर उजाला, ट्रिब्यून, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, नवभारत, नईदुनिया, लोकमत समाचार, आज, सन्मार्ग, दैनिक जागरण, राज एक्सप्रेस आदि लगभग सभी प्रतिष्ठित और बहु-प्रसारित पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं, आलेख, व्यंग्य आदि का निरंतर प्रकाशन हुआ। आपात्काल के दौरान प्रकाशित ‘सारिका’ के एक अंक में उनकी लघुकथा ‘शिकारी और भोले कबूतर’ बेहद चर्चित रही। अनेक संपादकों ने उनकी बाल कथाएँ, लघुकथाएँ और व्यंग्य को अपने संग्रहों में शामिल किया। मनोरमा वार्षिकी 2002 में ‘बीसवीं सदी में बाल साहित्य’ आलेख में प्रतिनिधि कहानीकारों के साथ विशेष रूप से नामोल्लेख मिलता है। लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व प्रख्यात बाल साहित्यकार डाॅ. राष्ट्रबंधु के संपादन में उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर ‘बाल साहित्य समीक्षा’ (कानपुर) का अंक भी निकला।
श्री तैलंग ने अनेक विधाओं में लिखा। बाल साहित्य की प्रकाशित पुस्तकों में ‘जूता चर्चा’ (मप्र साहित्य परिषद का पद्माकर पुरस्कार संग्रह), ‘पर्यावरण एवं संतुलित आहार’ (कोलकाता से मनीषा पुरस्कार प्राप्त नाटक संग्रह), ‘कथाओं में नाचता मोर’ (इलाहाबाद शकुंतला सिरोठिया पुरस्कार प्राप्त संग्रह), ‘बात का बतंगड़’ (हिंदी सभा, सीतापुर से पुरस्कार प्राप्त संग्रह), ‘मेढ़क की करामात’, ‘बकरी के जिद्दी बच्चे’, ‘अच्छे दोस्त बनाओ’ प्रमुख हैं। नवसाक्षर साहित्य में उन्होंने ‘फलो का राजा आम’, ‘प्याज और लहसुन’, ‘हमारा गाँव हमारा देश’, ‘वाहन कैसे बने कैसे चले’ पुस्तकें लिखीं जिन्हें भारत सरकार की नवसाक्षर प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार मिला। वे लिटरेसी हाउस, लखनऊ के सेमीनार्स, वर्कशॉप में भी विद्वान के रूप में आमंत्रित होते रहे। वहाँ रहकर उन्होंने ‘बोलती पुतलियाँ’ पुस्तक लिखीं जो लिटरेसी हाउस द्वारा पुरस्कृत और प्रकाशित की गई। सामाजिक चेतना फैलाने के लिए उन्होंने ‘जल: जीवन और जहर’ तथा ‘पर्यावरण एवं संतुलित आहार’ नामक पुस्तकें लिखीं। 
लगभग 1984 में उन्होंने व्यंग्य लेखन की शुरुआत की और पहला ही व्यंग्य ‘कुत्ता पालक कालोनी’ देश के सर्वाधिक पठनीय दैनिक ‘नवभारत टाइम्स’ में प्रकाशित हुआ। बाद के प्रकाशित व्यंग्यों -‘आम आदमी पर बहस: अंतर्कथा’ डाॅ. धर्मवीर भारती ने ‘धर्मयुग’ और राजेंद्र अवस्थी ने ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में ‘हास्य क्या है, व्यंग्य क्या है’ छाप कर प्रमुख व्यंग्यकारों में शामिल किया। उनका व्यंग्य संग्रह ‘कुत्ता पालक कालोनी’ और ‘घासचोरी का मुकदमा’ बेहद चर्चित रहे। ‘घास चोरी का मुकदमा’ को तो "मप्र साहित्य परिषद" का प्रतिष्ठित ‘शरद जोशी सन्मान’ और ‘मप्र हिंदी साहित्य सम्मेलन का’ वागीश्वरी सन्मान प्राप्त हुआ। मप्र साहित्य परिषद के पूर्व निदेशक डाॅ. देवेंद्र दीपक हरिकृष्ण तैलंग की एक पुस्तक ‘अपंग जिनसे दुनिया दंग‘ को विशेष रूप से याद करते हैं। उन्होंने उसी से प्रेरणा पाकर भारत भवन में राष्ट्रीय स्तर का एक कवि सम्मेलन करवाया जिसमें नेत्रहीन रचनाकारों ने शिरकत की थी। इसके अलावा श्री तैलंग ने ‘संस्कृत कथाएँ’ और ‘बुद्ध चरितम्’ नामक पुस्तकें भी लिखीं जिनमें संस्कृत साहित्य की महान रचनाओं का संक्षिप्त अनुवाद शामिल है। यही नहीं, उनकी लिखी ‘सामान्य ज्ञान‘ (जूनियर) और ‘सामान्य ज्ञान’ (सीनियर) भी जानकारीप्रद रहीं। प्रारंभ से ही उनकी रचनाओं का प्रसारण आकाशवाणी भोपाल तथा लखनऊ से होता रहा। वे दूरदर्शन दिल्ली और भोपाल केंद्र से भी दिखाई दिए। आकाशवाणी, भोपाल के वे दो वर्ष शैक्षिक प्रसारण सलाहकार भी रहे।
हालाँकि किसी वाद अथवा खेमेबाजी में उनका विश्वास या रुचि कभी नहीं रही। पर उन्होंने कई संस्थाओं में सक्रिय भूमिका निभाई। विदिशा में पद स्थापना के दौरान वे हिंदी साहित्य सम्मेलन, विदिशा के अध्यक्ष रहे और तब अनेक साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों की खूब सराहना हुई। जनवादी लेखक संघ, सागर सांस्कृतिक परिषद, मप्र लेखक संघ के पूर्व पदाधिकारी भी रहे। लिटरेसी हाउस, लखनऊ, राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद, दिल्ली, मप्र माध्यमिक शिक्षा मंडल, मप्र पाठ्य पुस्तक निगम, मप्र लोक शिक्षण को उन्होंने लेखकीय सहयोग तथा कुछ शैक्षिक योजनाओं/ पाठ्य पुस्तको की रूपरेखा तैयार करने में सहयोग दिया। 
उनकी रचनाओं को ढेर सारे पुरस्कार-सन्मान मिले। नीलकंठेश्वर महाविद्यालय (खंडवा) से प्रादेशिक निबंध पुरस्कार, मप्र लोक शिक्षण से सर्वोत्तम बाल साहित्य प्रतियोगिता में दो पुरस्कार, मप्र लोक शिक्षण की शैक्षिक निबंध प्रतियोगिताओं में तीन वर्षों तक लगातार प्रथम पुरस्कार, मप्र साहित्य परिषद द्वारा पद्माकर तथा शरद जोशी पुरस्कार, मप्र हिंदी साहित्य सम्मेलन का वागीश्वरी पुरस्कार, कोलकाता की संस्था मनीषिका का मनीषा पुरस्कार, इलाहाबाद में शकुंतला सिरोठिया पुरस्कार, कानपुर में बाल कल्याण परिषद द्वारा पुरस्कार, बलिया में नागरी बाल साहित्य संस्थान का पुरस्कार, दतिया में हिंदी साहित्य समिति द्वारा पुरस्कार, भोपाल में भीष्म सम्मान, अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन द्वारा दिल्ली में तत्कालीन राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा के हाथों ‘साहित्यश्री’ तथा बंगलौर में ‘भारत भाषा भूषण’ उपाधि से विभूषित हुए। इलाहाबाद में ‘मीरा स्मृति सम्मान’ और भोपाल के ‘बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केंद्र’ से भी वे सम्मानित हुए। ‘करवट कला परिषद’ ने गत 25 दिसंबर 2013 को ‘कला साधना सम्मान’ और इसी वर्ष 17 जून 2014 को उन्हें भोपाल के ‘दुष्यंत संग्रहालय’ में सत्यस्वरूप माथुर श्रेष्ठ साहित्यकार सम्मान से विभूषित किया गया। यही नहीं, 14 सितंबर 2014 को मरणोपरांत भी श्री तैलंग को "जेके हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर" ने ‘आधुनिक दधिचि’ का सम्मान मिला।

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

स्मृति शेष श्री हरिकृष्ण तैलंग

स्मृति शेष श्री हरिकृष्ण तैलंग

शब्द शिल्पी का हिंदी दिवस पर देह दान


// ताउम्र हिंदी की सेवा करनेवाले 80 वर्षीय वरिष्ठ रचनाकार श्री हरिकृष्ण तैलंग के 14 सितंबर 2014 को देहावसान पश्चात उनकी अंतिम इच्छानुसार मेडिकल स्टडी और रिसर्च हेतु कोलार रोड, भोपाल स्थित "एलएन मेडिकल काॅलेज एंड रिसर्च सेंटर" में उनकी देह समर्पित कर दी गयी। प्रख्यात डाॅक्टर  डीके सत्पथी देहदाताओं को "आधुनिक दधीची" मानते हैं जिनका मृत शरीर राक्षस रुपी अनगिनत रोगों से लड़ने में अध्धयनरत चिकित्सकों की मदद करेगा।// 
  
‘श्री हरिकृष्ण तैलंग की व्यंग्य रचनाएँ जीवन में व्याप्त छद्म को पकड़ती हैं। उन्होंने बड़ी बारीकी से अपने आसपास की जिंदगी को देखा और समझा है, उसके अंदर मौजूद व्यंग्य को बाहर लाने की सफल कोशिश की है। अपनी रचनाओं में श्री तैलंग ने आज के पाखंड और मानवीय संवेदना के प्रति तथाकथित संभ्रांतता की पोल अच्छी तरह खोली है। वर्तमान, स्नाब सभ्यता को बेनकाब किया है।’ उक्त मान्यता सुपरिचित समीक्षक और शिक्षाविद् रमेश दवे की है। 27 दिसंबर 1934 को राजा बिलहरा (सागर) में जन्मे श्री तैलंग ने रचनात्मक और यशस्वी जीवन जिया और मरणोपरांत मानव शरीर की संरचना और उसकी क्रियात्मक प्रक्रिया समझने हेतु निर्जीव देह को चिकित्सकीय अध्ययन हेतु अर्पित कर उत्कृष्ट प्रेरणा का अनुकरणीय सृजन कर दिया। उल्लेखनीय कि हिंदी की दीर्घ सेवा करनेवाले इस अनूठे रचनाकार ने अपने जीवन की आखिरी सांस भी हिंदी दिवस (14 सितंबर) को ही ली जिसे राष्ट्रभाषा हिंदी का हर साहित्यकार और प्रेमी सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानता है। 
उन्होंने व्यंग्य पुस्तक "घासचोरी का मुक़दमा" में लिखा, ‘मेरा सरोकार सिर्फ विपक्ष में खड़ा होना है, पक्ष के और विपक्ष के भी। और विपक्ष के भी किसी विपक्ष में, जो बहुतों का पक्ष हो सकता है, पर एक विवेकसंगत तार्किकता और सच होने की अनुभूति के साथ।’ वे चर्चा में अक्सर कहते थे कि सारा संसार दो पक्षों में ही विभक्त नहीं है। संसार भर के लोगों का भाग्य बारह राशियों में नहीं आँका जा सकता। अगर ऐसा ही होता तो अँधेरे में जागता संयमी या विवेकशील क्या कुछ देख पाता ? कबीर भी छाती ठोककर यह नहीं कहते -दोनों ने ही राह नहीं पाई, और, संसार खाने और सोने में मगन है, सिर्फ कबीर ही जागता तथा रोता है।’ 
लेखन का आरंभ यूँ श्री तैलंग ने बाल साहित्य से किया और तब की सर्वश्रेष्ट, बहुपठित बाल पत्रिकाओं -‘पराग’, ‘बालसखा’, ‘नंदन’, ‘बालभारती’ आदि में प्रमुखता से प्रकाशित होकर प्रथम पंक्ति के शीर्षस्थ बाल रचनाकारों में अपनी अमिट छाप गढ़ी, जो अंत तक उनके कृतित्व पर चस्पा रही। नई पीढ़ी के उत्तम चरित्र निर्माण और चहुँमुखी उत्थान में बतौर श्रेष्टतम बाल साहित्यकार उनके साहित्य का अमूल्य योगदान है। बाल मनोविज्ञान के अदभुत, सक्षम और संस्कारशील लेखन के लिए वे प्रतिष्ठित रहे। ‘कुत्तापालक कालोनी’ और ‘घास चोरी का मुकदमा’ शीर्षक व्यंग्य संग्रहों ने उन्हें अग्रणीय व्यंग्यकारों में स्थापित किया। ‘घास चोरी का मुकदमा’ को मप्र साहित्य अकादमी का प्रतिष्ठित "शरद जोशी सम्मान" और मप्र हिंदी साहित्य सम्मलेन का "वागीश्वरी सम्मान" भी प्राप्त हुआ। उनकी मारक और गुदगुदानेवाली व्यंग्य रचनाओं में समकालीन जीवन की विसंगत और विरोधाभासी विडंबनाओं के पैने, चुुटीले विश्लेषण को खूब सराहा। समीक्षक जो गुण लीक से हटकर मानते हैं, वह यह कि व्यंग्य के लिए उन्होंने कहानी, नाटक, उपन्यास, कविता जैसी किसी विधा को माध्यम न बनाकर उसको किस्सगोई या अति नरेटिविज्म से बचाया, इसीलिए उनका व्यंग्य सौ फीसदी खरा, खालिस, टंच व्यंग्य माना गया, दूसरी विधा नहीं। उनके अनुसार, सार्थक व्यंग्य रचना की भाषा रचनात्मक माध्यमों से तरह-तरह के तेवर प्रकट करती है। उन्होंने व्यंग्य को अंग्रेजी शब्द ‘सटायर’ का अनुवाद मात्र नहीं माना। न ही व्यंग्य की तुलना हास्य से करने के हिमायती थे। ‘आयरनी’ शब्द को भी वे व्यंग्य का समानार्थी अथवा पर्यायवाची नहीं मानते थे बल्कि उसे साहित्य की एक संपूर्ण रचनात्मक शैली कहते रहे। विद्वतजन मानते हैं कि आयरनी व्यंग्य से अधिक गंभीर अभिव्यक्ति है। पुरस्कृत व्यंग्य कृति में उन्होंने समर्पण के तहत् जो कटाक्ष -‘बेटियों को, जो औरत बनने के साथ-साथ समाज में व्याप्त बहुविध व्यंग्य की शिकार बने रहने को अभिशप्त रहती हैं’-  किया, वह उनकी संवेदनात्मक और गहरी चिंतन दृष्टि का परिचायक है। पहले व्यंग्य संग्रह "कुत्ता पालक कॉलोनी" में उन्होंने समर्पण में लिखा -‘उनको जो व्यंग्य उपजा रहे हैं’। श्री तैलंग कहा करते थे कि ‘व्यंग्य जिया ज्यादा जा रहा है। लिखा कम जा रहा है। समय की नियति ने सभी रसों में मिलावट कर रखी है। श्रृंगार, करुणा, वात्सल्य आदि की परिणिति अब व्यंग्य होती है। मिलावट समर्थ व्यंग्यकार को नजर आ रही है और वह कचोट खा-खा जाता है। वही कचोट वह रचना में उतार रहा है।’
उनकी राय थी कि ‘सारा समाज स्वर्ण में सारे गुण देख रहा है, जबकि व्यंग्यकार की तीसरी आँख स्वर्ण कलश में भरे जहर को पहचान रही है। सुखिया सब संसार है पर दुखिया अकेला व्यंग्यकार। जब सब खाने-पीने, मौज-मस्ती में दिन और सोने में रात गुजार रहे हैं, व्यंग्यकार जाग रहा है और अँधियारे की बढ़ती कालिमा पर रो रहा है। पर विडंबना यह है कि उसका रोना ‘शिष्ट हास्य’ कहा जा रहा है।’ वे पूरे भरोसे के साथ मानते थे कि ‘जब आजादी के बाद का इतिहास लिखा जायेगा तो इतिहासकार को व्यंग्य साहित्य प्रमाणिक सामग्री मुहैया करेगा। अन्य सामग्री तिथियाँ और नाम जुटाने के काम की भर रहेंगी। व्यंग्यकारों पर ऐसी संभावना का दायित्व है। व्यंग्य लेखन की यही सार्थकता मुझे लगती है, इसलिए विनय है कि व्यंग्यकार को पूरी ईमानदारी और दृढ़ता के साथ पैनी नजर रख कुशल कलम थामे रहना होगा।’     
वे कहते थे -"बढ़ते जा रहे पाखंड की विद्रूपताएँ, विसंगतियाँ सामाजिक आचरण की समरसता को हर जगह भंग, ध्वस्त कर रही हैं, एक सच्चा व्यंग्यकार अपनी पैनी नजर से उन्हीं को सामने रचता है। चूँकि हर वस्तु, घटना, आदमी का चरित्र, कार्यकलाप बहुआयामी हैं, जटिल हैं, उन बहुआयामों, जटिलताओं को परखकर रचनाकार तह तक जाकर असलियत को उभारता है, व्यक्ति, समाज, देश, पर्यावरण आदि की बेहतरी के लिए अपना पक्ष विवेचित करता है।   
श्री तैलंग की कुछ चर्चित पुस्तकें
देश के शीर्षस्थ व्यंग्यकारों में शुमार डाॅ. ज्ञान चतुर्वेदी के अनुसार ‘सामान्य से लगनेवाले, लगभग स्थानीय-से विषयों को व्यापक व्यंग्य का फलक देना, वह भी एकदम सीधी-सहज-सरल भाषा में, बगैर किसी चमत्कारिक शैलीगत प्रयोगों के मगर फिर भी अपने व्यंग्य में एक:बात’ पैदा करना श्री तैलंग की विशेषता रही है। वे आज की पीढ़ी के बहुत-से स्वनामधन्य व्यंग्यकारों को अच्छे व्यंग्य के दो-चार पाठ पढ़ा सकते हैं।’
श्री तैलंग का ‘वे लोग’ परिवार से जीवंत रिश्ता रहा है। बाल साहित्य, नवसाक्षर, प्रौढ़, व्यंग्य आदि विधाओं की उनकी प्रमुख पुस्तकें ‘पतंग बोली’, ‘होली का हौवा’, ‘जूता चर्चा’, ‘बात का बतंगड़’, ‘मेंढक की करामात’, ‘बोलती पुतलियाँ’, ‘वाहन कैसे बने कैसे चले’, ‘हमारा गाँव हमारा देश’, ‘फलों का राजा आम’, ‘प्याज और लहसुन’, ‘पर्यावरण और संतुलित भोजन’, ‘जल: जीवन और जहर’, संस्कृत कथाएँ’, ‘बुद्धचरितम्’ ‘अपंग जिनसे दुनिया दंग’, ‘बकरी के जिद्दी बच्चे’, ‘अच्छे दोस्त बनाओ’, ‘कथाओं में नाचता मोर’ आदि हैं। "नाम एक नगर अनेक" और "नाम एक व्यक्ति अनेक" उनकी प्रकाशनाधीन पुस्तकें हैं। एक लोकप्रिय और श्रेष्ठ शिक्षक के रूप में भी उनकी पहचान अमिट रही है। 

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

सिविल लाइनवाले हनुमानजी


व्यंग्य/हरिकृष्ण तैलंग
सिविल लाइनवाले हनुमानजी
//तुलसीदास को भगवान राम से हनुमानजी ने ही मिलवाया था। एकनिष्ठ रामभक्त को भी ‘मीडिएटर’ का सहारा लेना पड़ा था। शायद इस कलिकाल में भगवान का यही रवैया है या शायद हनुमान ने ही रामजी को सुझाया हो -'तुलसी आपका भक्त जरूर है, पर परम्परा विरोधी है। पीडि़त जनता की ओर है। आम आदमियों की भाषा बोलता है। जनकवि कुछ उल्टे-सुल्टे पश्न न पूछ बैठे ? आम आदमियों की पीड़ाएँ बताकर, आपको द्रवित कर, इस रावण राज्य के हनन का निमंत्रण न दे दे। आप ठहरे लोक रंजक। राजपाट छोड़-छाड़कर फिर अवतार न ले लें। एक ही रावण से युद्ध कर हम लोग तो थक चुके हैं। अब रामराज्य में मजे की वंशी बजा रहे हैं। दर्जनों रावणों से कौन लड़ेगा ? सो हे रामजी, बेचारे तुलसी से, जो रामराज्य के सपनों में खोया रहता है, मिल तो लो पर बोलना कुछ नहीं। बाकी हम समझ लेंगे। रामजी भी अपने निजी सेवक की बात मान गए। पुरानी परम्परा है, माननीयों से मिलना हो तो माध्यमों के माध्यम से मिल लो, पर पहले उन्हें संतुष्ट करके।'//
बहुत दिनों से बाहु पीड़ा से परेशान हूँ। वाम बाहु है जो पीड़ा दे रहा है। डाॅक्टर बदले, दवाएँ बदलीं पर दर्द में कोई खास हेर-फेर नहीं हुआ। दर्द से पूरा शरीर बेचैन रहता है। पहले शरीर अच्छा खाता-पीता था। चैन से सोता था, पर अब वामांग शरीर सुख के विरुद्ध हो गया है। पता नहीं कौन-सा और कितना भ्रष्टाचार हो गया मुझसे कि वामांग इस तरह विचल उठा है ?
पत्नी कहती है -‘वामांग शरीर का आधा हिस्सा है। वह शरीर सुख और पुष्टता के लिए बराबरी का साझीदार है। दिल भी उसी तरफ है जो पूरे शरीर में रक्त-प्रवाह बनाए रखता है। पर यदि सारे सुख दाएँ हाथ की हथेली पर ही रखे जाते रहें तो वामांग विद्रोह कर सकता है। पूरे शरीर को तकलीफ में डाल सकता है। तुम्हारे दाएँ बाहु ने कभी इस तरह सोचा ही नहीं। बस, मजे से सारी सुख-सुविधाएँ चुन-चुनकर उठाता रहा। मीठा-मीठा खाता-पीता रहा। इसी से तुम्हारा वाम बाहु चिढ़ गया है।’
पत्नी की बात गड़ती तो है, पर कोई उत्तर नहीं देता। इस कष्ट में वही सेवा कर रही है पर पैनी बातें भी कर देती है। मित्रों को पता चला तो उनका आना-जाना शुरु हुआ। हर एक अपने-अपने नुस्खों के साथ आया, पर एक दिन एक मित्र ने साफ कहा -’आपने बीसियों सूत्रों से प्राप्त उपचार कर डाले पर दर्द गया नहीं। वामांग का दर्द सूत्रों से संतुष्ट न होगा। उसके लिए संपूर्ण शक्ति लगाना पड़ेगी। एक ही रास्ता है तुम्हारे कष्ट निवारण का।’
‘कौन-सा ?’ मैं उत्सुकता से पूछ बैठा।
‘हनुमानजी की शरण गहो। इस कलिकाल में वही एकमात्र संकटमोचन हैं।’ मित्र ने पूरे आत्मविश्वास से कहा।
तभी पत्नी भी आकर मूढ़े पर बैठ गई। बोली -‘मैं तो कब से कह रही हूँ, पर सुनते कहाँ हैं ? मुझे दिन भर परेशान करते रहते हैं।’ उसके चेहरे पर शिकायत उभर आई थी।
‘तभी वामांग की पीड़ा सह रहे हैं। भाभीजी, सारे देश में जब आदमी निराश हो जाता है तो देवी-देवताओं की शरण में आ जाता है। पुरातन काल से यही भारतीय परंपरा है। नहीं तो इस देश में तैंतीस करोड़ देवताओं की कल्पना की जाती भला ?’ मित्र बोले।
‘हाँ भाई, अब तो निराशाएँ और बढ़ती जा रही हैं। तभी तो देवी-देवताओं की संख्या में भी इजाफा हो चुका है। संतोषी माता, भगवान रजनीश, सत्य साईं बाबा, प्रजापति ब्रह्मा आदि चालीस-पचास देवता और बढ़ गए हैं। आजादी के बाद इस क्षेत्र में परिवार नियोजन की कोई बंदिश नहीं लगी।’ मैंने मुस्कराकर कहा।
‘देखो जी, दूसरों के सामने ताने मत दिया करो। संतोषी माता का व्रत करती हूँ। तभी निभा रही हूँ।’ पत्नी को बुरी लगी मेरी बात।
‘भाभीजी, ठीक कहती हैं। नए देवी-देवताओं में प्रताप न होता तो उनके नए-नए मंदिर भव्य और भीड़ जोड़ने वाले होते क्या ? आप तो कुछ ले आइए खाने-पीने को, तब तक मैं इन्हें समझाता हूँ।’ मित्र ने कहा। पत्नी अपना पल्लू समेट कर अंदर चली गई।
‘आप जरूर भाभी को तंग करते रहते हैं। उसी की सजा है यह वामांग का दर्द। अगर ठीक करना चाहते हो तो हनुमानजी की शरण में जाओ। शनि और मंगल को दर्शन करो उनका’, मित्र बोले।
‘करूंगा दर्शन। पर किस हनुमान के पास जाऊँ ? मुहल्ले के ही या मरघटिया हनुमान के ?’ मैंने पूछा।
मित्र ने मुँह बिचकाया। बोले -‘इतने नए-नए हनुमान मंदिर बन गए हैं, पर तुम उन्हीं मरघटिया हनुमान से चिपके हो। वह तो काफी पुराने हैं। उनका प्रताप अब जाता रहा।‘
‘तो फिर’, मैंने पूछा।
वह बोले -‘सिविल लाइन वाले हनुमानजी का आजकल बड़ा प्रताप है। पैंतीस साल पहले एक बाबा ने उनकी स्थापना की थी। पहले की मढि़या अब आलीशान मंदिर बन चुकी है। जो भी, जैसी भी पीड़ा निवारण चाहता है अपनी अर्जी लगाता है और फल पाता है। हाँ, पीड़ा के अनुसार दर्शनों की संख्या और प्रसादी का सवाल है।’
‘दर्शन तो कई बार कर आऊंगा पर प्रसादी ? कच्ची चढ़ती है या पक्की ?’ मैंने मुस्कराकर पूछा।
‘कच्ची चढ़ती होगी तुम्हारे मरघटिया हनुमान के यहाँ। सिविल लाइन वाले को शुद्ध पक्की चाहिए। वह भी पउवा भर नहीं फुल एक किलो, नहीं तो पुजारी भगा देगा तुम्हें’, मित्र ने आत्मीय लहजे में बताया।
‘ठीक है। भुगतूंगा उसे भी। पीड़ा से मुक्ति तो मिले’, मैं कह रहा था कि श्रीमती प्याले खनखनाते आ गई। टेबल पर रखते हुए बोली -‘अभी तो मैं भुगत रही हूँ। मुक्ति तो मुझे मिलेगी’, और भीतर चली गई।
मित्र के जाने के बाद मैं सोचने लगा, मित्र ने बात तो पते की कही है। हनुमानजी तो पुराने जागृत देवता हैं। चिरजीवी हैं। इस कलिकाल में भी साक्षात् दर्शन देते हैं। तुलसीदास को भगवान राम से उन्होंने ही मिलवाया था। एकनिष्ठ रामभक्त को भी ‘मीडिएटर’ का सहारा लेना पड़ा था। राजा राम से कवि तुलसी की मुलाकात दो बार हुई थी। शायद इस कलिकाल में भगवान का यही रवैया है या शायद हनुमानजी ने ही रामजी को सुझाया हो -तुलसी आपका भक्त जरूर है, पर परम्परा विरोधी है। पीडि़त जनता की ओर है। आम आदमियों की भाषा बोलता है। जनकवि कुछ उल्टे-सुल्टे पश्न न पूछ बैठे ? आम आदमियों की पीड़ाएँ बताकर, आपको द्रवित कर, इस रावण राज्य के हनन का निमंत्रण न दे दे। आप ठहरे लोक रंजक। राजपाट छोड़-छाड़कर फिर अवतार न ले लें। एक ही रावण से युद्ध कर हम लोग तो थक चुके हैं। अब रामराज्य में मजे की वंशी बजा रहे हैं। दर्जनों रावणों से कौन लड़ेगा ? सो हे रामजी, बेचारे तुलसी से, जो भारत में रामराज्य के सपनों में खोया रहता है, मिल तो लो पर बोलना कुछ नहीं। बाकी हम समझ लेंगे। रामजी भी अपने निजी सेवक की बात मान गए। पुरानी परम्परा है, माननीयों से मिलना हो तो माध्यमों के माध्यम से मिल लो, पर पहले उन्हें संतुष्ट करके।
फिर याद आया, तुलसी को भी बाहु कष्ट हुआ था। बचपन से ही उन्होंने बहुत कष्ट सहे थे। जवानी कुछ सरस हुई थी कि वामांग विचल गया। सो उन्हें रघुनाथजी से प्रीत करनी पड़ी। उनके गुणगान का पट्टा लिख दिया उन्होंने। ‘रामचरित’ रचकर राम का यश जगत् व्यापी बना दिया। फिर भी उन्हें अपने कष्टों के लिए ‘थ्रू प्राॅपर चेनल’ कई अर्जियाँ देना पड़ी थीं। ‘विनय पत्रिका’ जैसा काव्य ग्रंथ ही बन गया उन अर्जियों से। रामराज्य में संतों को ही उचित मार्ग अपनाना पड़ता है।
बाद में, उन्हें दकियानूसी ब्राह्मणों ने पीड़ा पहुँचाई। उनकी खिल्लियाँ उड़ाकर उन्हें खूब खिजाया। फिर तुलसी को बाहु पीड़ा ने सताया था। मैं सोचता हूँ कि तुलसी का वाम बाहु ही पीड़ाग्रस्त हुआ था, क्योंकि उसी काल में उन्होंने पीड़ा मुक्ति के लिए ‘हनुमान बाहुक’ लिखा जो दाहिने हाथ से ही लिखा होगा। अगर दायें बाहु में पीड़ा होती तो ‘हनुमान बाहुक’ कैसे लिखा जाता ? (इस शोध के लिए मुझे डाॅक्टरेट मिलना चाहिए) 
मेरे शंकालु मन में तभी एक प्रश्न और उछला। बाहु कष्ट के लिए तुलसी ने राम बाहुक क्यों नहीं लिखा ? शंका समाधान भी मेरे मन ने किया, रामजी सर्वप्रभुत्व सम्पन्न थे। लोक कल्याण के बड़े-बड़े मसले थे उनके पास। दुनिया भर की चिंताएँ उनके सिर-माथे रहती हैं। भारत तो अपना राज्य है। गरीब और संत प्रकृति के संतोषी भक्तों के लिए उनके पास फुरसत कहाँ ? वह छोटा काम क्यों करें ? वह तो उद्धारक हैं। पूरे शरीर का ही उद्धार करते हैं। उन्होंने अहिल्या का उद्धार किया ही था जिसका पूरा शरीर शिला हो गया था। कठोर और रसहीन। राम ने अपने चरण कमल छुआकर उसे कोमलांगी, सुंदर, सरस नारी में बदल दिया था। अगर तुलसी के पूरे शरीर में लकवा मार जाता तो अर्जी पाने पर रामजी आगे आकर उनके पूरे शरीर का उद्धार कर देते। राम नाम सत्य हो जाता।
तुलसी को इतनी समझ थी। छोटे-से काम के लिए वह सर्वप्रभुत्व सम्पन्न प्रभु को क्यों परेशान करते ? जब पीए ही मामला निपटा सकता है तो माननीय को क्यों तकलीफ दी जाये ? शासन के गोरखधंधों से गुजरते हुए कवि तुलसी की यह अनुभव यात्रा थी कि ‘राम से बड़ो राम कर दासा’। सो तुलसी ने ‘हनुमान बाहुक’ लिखा। मैं तुलसी की अर्जी के कुछ वाक्य बुदबुदा उठा -‘को नहीं जानत है जग में, कपि संकटमोचन नाम तिहारो, बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जो कछु संकट होय हमारो’। 
उसी समय मेरी पत्नी ने शीघ्रता से प्रवेश किया और हाथ की थाली स्टूल पर रखते हुए बोली -‘लो, दलिया खा लो।’ 
मैंने कहा -‘अभी हनुमानजी से संकट हरने की प्रार्थना कर रहा था कि तुम यह संकट ले आईं। अरे, खीर नहीं बना सकती थी क्या ?’
वह बोली -‘चावल बादी करते हैं। मुझे टीवी देखना है।’ जितनी झपाटे से वह आई थी उससे ज्यादा सपाटे से वह चलती बनी। मेरी पत्नी सीता के आगे बेचारे हनुमानजी भी मजबूत दिखते हैं, सोचते हुए मैं दलिया निपटाने लगा।
शनिवार को सिविल लाइन जाने की मानसिक तैयारी में जुटा। शाम तक अपने-आपको तैयार करता रहा। दरअसल हिम्मत नहीं हो रही थी। लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे ? कहीं कोई कह न दे -‘भैया, तुम भी बिगड़ गए। कहीं हनुमानजी या उनका पुजारी यह न सोचे, बेटा, अब आए हो जब तकलीफ में पड़े। सुख में कभी याद भी नहीं किया, अब पीड़ा में पड़े तो आ पहुँचे। देवताओं के दरबार में आना ही पड़ता है आदमी को। फिर तुम जैसे अदने आदमी की अकड़ ज्यादा दिनों तक कैसे चलती ? अब घनचक्कर बना दूंगा तुमको। लगाते रहो परिक्रमा। पर जाना तो है ही। सो पाँच बजते-बजते घर के बाहर कदम रख दिया। एक सौ एक रुपए पत्नी ने प्रसाद के लिए पेंट की पाॅकेट में रख दिये थे। 
चार सड़कें -साम, दाम, दंड, भेद सिविल लाइन जाती हैं। किस सड़क पर कदम रखूँ, किसे चुनूँ ? पता नहीं किस सड़क पर चलकर पहुँचने वालों की पहले सुनी जाती है। चौराहे पर आया तो चक्कर में पड़ गया। फिर सोचा, क्यों न गली कूचों से चला चलूँ। आज न सुनी जायेगी तो मंगल को फिर विनती कर लेंगे। कई शनिवार और मंगल लगेंगे अभी तो।
हनुमान मंदिर के नजदीक पहुँचा तो मंदिर के बाहर काफी चहल-पहल दिखी। अनेक सरकारी गाडि़याँ, स्कूटर, बाइक्स आदि वहाँ खड़े थे। सजी-धजी महिलाएँ, चपल नवयुवतियाँ, नजरें फेंकते प्रौढ़ पुरुष, फिकरे कसते नौजवान, खादीधारी, टेरीकाट-जींसधारी सभी तरह के लोग आ-जा रहे थे। कई परिचित चेहरे भी दिखे। पुलिस इंस्पेक्टर मातादीन दर्शन कर चले आ रहे थे। नमस्कार कर पूछा -‘आप कैसे ?’ 
बोले -‘साले, एसपी ने इधर लाइन अटैच कर दिया है। एक शोहदे को चार-पाँच बेंत सटकार दिये थे। वह किसी का भाई-भतीजा था साला। अब हनुमानजी की मेहरबानी हो तो वापस थाना मिल जाये। भंडारा कर दूंगा।’ और वह चले गये।
सेठ बिहारीलाल अपनी गजकाया पत्नी के साथ हाथी की चाल से चले आ रहे थे, पूछा -‘सेठजी, कैसे ?’
‘संकटमोचन के दरबार में अर्जी लगाने आया था जी। पाँच सौ बारे ज्यादा दिखाकर खाद्य विभाग ने मुकदमा चला दिया। हफ्ता पहुँचाने के बाद यह हाल है। बच गया तो चोला चढ़ाऊंगा।’ कहते हुए दोनों अपनी कार में धसे और चलते बने। 
तभी तेज हाॅर्न बजने लगा तो किनारे हो गया। देखा, राज्य मंत्री की कार थी। एक एमएलए भी बैठा था। हनुमानजी की कृपा से कोई काम मुश्किल नहीं, ऐसा मान वे दर्शनों को आये होंगे। डायरेक्टर आहूजा भी दिखे। पत्नी और कन्या के साथ पुड़े और मालाओं से लदे थे। पाँच-पाँच लाख में पचासों भर्तियों का आरोप विधानसभा में उन पर लगाया गया था। डाॅक्टर सोनी भी दिखे। बेचारे का ट्रांसफर किसी प्राथमिक चिकित्सा केंद्र में कर दिया गया था। जुल्फें छितराये, गले में रंग-बिरंगा छींट का रूमाल बाँधे, चार-पाँच छोकरों से घिरा नत्थू सिंह भी दिखा। बलात्कार के आरोप में पिछले दिनों पकड़ा गया था और अब जमानत पर था। इंजीनियर बाधवानी भी दिखे। उनकी सीमेंट घपले की इन्क्वायरी चल रही है। प्रो. कंचनकुमार अपनी नई नवेली पत्नी के साथ दिखे जो कुछ वर्ष पहले उनकी स्टूडेंट थी। अभी हाल में उन्होंने कोर्ट मैरिज की थी। संतान कामना से हनुमान मंदिर दर्शन के लिए आए थे। और भी कई लोग थे। अनेक समस्याएँ, अनगिनत कष्ट थे उन सबके। सभी को भरोसा था कि हनुमान दरबार में उनके संकट दूर हो सकेंगे। वे भी हनुमानजी से कुछ न कुछ वायदा कर आये थे, करने वाले थे। हनुमान मंदिर का वैभव और सजावट उन सबकी कृतज्ञ प्रवृत्ति का परिणाम थी।
मेरे मन में फिर शंका का संचार हुआ। कैसी-कैसी महत्वपूर्ण मुसीबतों को हरने का काम है हनुमानजी के पास। भला मेरी पीड़ा हरने के लिए उन्हें समय मिलेगा, याद रहेगी मेरी पीड़ा ? फिर भी अंदर की ओर बढ़ा। गर्भगृह के बाहर दो पुजारी बैठे हैं। भीड़ है उनके पास। धक्का-मुक्की भी चल रही है। पुजारीगण प्रसाद, नारियल, मालाएँ लेकर गर्भगृह में बैठे मुख्य पुजारी की ओर बढ़ा देते हैं। मैं भी लाइन में लग गया। तभी वह मिनिस्टर आया। साथ में एमएलए आया। दर्शनार्थियों में हड़बड़ी मच गई। पुजारी खड़े हो गये। झुककर बोले -‘हटो रास्ता दो, मिनिस्टर साहब हैं। आइए साहब, आइए श्रीमान।’
श्रीमान मुस्कराते चेहरे से, इधर-उधर नजर फेंकते, नमस्कारों के उत्तर में सिर हिलाते गर्भगृह में घुस गये। खड़ा हुआ मुख्य पुजारी बोला -‘स्वागत है, अब आपके केबिनेट में जाने के अवसर बढ़ गये हैं। हाईकमान को हनुमानजी स्वप्न में हुक्म देने ही वाले हैं और भैयाजी, आप भी किसी निगम के अध्यक्ष होनेवाले हैं। मंत्री का दर्जा मिलेगा। बोलो -हनुमानजी की जय !’ पूरा मंदिर जय जयकार से गूँज उठा। घंटे टनटना उठे।
मुख्य पुजारी बोला -‘श्रीमान, यदि अनुकंपा हो जाये और मंदिर के पास एक धर्मशाला बन जाये तो भक्तों का कष्ट दूर हो जायेगा।’ तभी इंजीनियर बाधवानी लाइन को छोड़ता हुआ आ खड़ा हुआ और मिनिस्टर को नमस्कार कर चरणों में झुक गया। मंत्रीजी खिल गये। बोले -‘लो धर्मशाला का डौल हो गया। बाधवानी, कुछ करो इंतजाम। धरम का काम है।’
‘जी सर, आपकी दुआ से हो जायेगा।’ बाधवानी ने हाथ जोड़े-जोड़े ही कहा।
आहूजा, नत्थूसिंह, कंचन कुमार और दो-तीन और मिनिस्टर तक आ गये थे, मुस्कराकर नमस्कार कर रहे थे। 
‘क्यों नत्थू सिंह क्या हाल है ?’ मिनिस्टर ने पूछा।
‘ठीक है साब, मेरी छवि बिगाड़ी जा रही है। झूठे आरोप में फँसाया गया हूँ।’ नत्थूसिंह बोला।
‘भाई, हनुमानजी सबका संकट हरते हैं।’ मिनिस्टर बोले। फिर हनुमानजी को नमन कर कुछ बुदबुदाते रहे और सबके साथ गर्भगृह के बाहर आ गये। चारों-पाँचों उनके पीछे-पीछे थे।
मैं यह सब नजारा नजदीक से देख-सुन रहा था। कैसे-कैसे और कितने लोग हनुमानजी के मंदिर में हाजिर होते हैं। तभी देखा, एक औरत दो छोटे-छोटे बच्चों के लिए पुजारियों के पास खड़ी उलझ रही थी। वह गर्भगृह तक जाना चाहती थी। वह कह रही थी -‘महाराज, मुझे मूर्ति तक जाने दो। वहीं मैं प्रसाद चढ़ाऊंगी। छह-सात बार आ चुकी हूँ पर काम नहीं हुआ। मुसीबत की मारी हूँ महाराज, मुझे भीतर जाने दो।’
मैं उस औरत के पास पहुँचा। उसकी नजरों का याचना भाव मुझे अंदर तक भेद गया। मैंने पूछा -‘क्या मुसीबत है तुम्हारी ?’ वह बोली -‘तीन साल हो गये मेरे पति को मरे। शिक्षा विभाग में चपरासी थे। अभी तक न पिंसन मिली, न फंड का पैसा। ससुरे दफ्तर वाले कहते हैं कि सरबस बुक नहीं मिल रही। फंड का हिसाब नहीं है। मुझे भी काम पर नहीं लगाते। पाँच हजार रुपये माँगते हैं। अब हनुमानजी के दरबार में आई हूँ विनती करने।’ औरत की आँखें छलछला उठी थी।
मैंने पुजारी से पूछा -‘क्यों नहीं जाने देते इस बेचारी को ?’
पुजारी ने मुझे गहरी नजर से देखा और पूछा -‘आप क्या कोई नेता हैं ? पत्रकार हैं ?’
‘नहीं, मैं आदमी हूँ’, मैं बोला।
‘अगर आप आदमी हैं तो आपको नजर आया होगा कि मूर्ति तक किन-किन को जाने दिया जाता है।’ पुजारी बोला।
‘पर यह तो मुसीबत की मारी है, गरीब, असहाय विधवा है। इसे जाने दो।’
‘सभी मुसीबत के मारे यहाँ आते हैं। सभी हनुमानजी के आगे गरीब और असहाय हैं, और हम मुख्य पुजारी के सामने।’ पुजारी बुदबुदाया।
मुझे लगा कैसे-कैसे भूत-प्रेत हनुमानजी को घेरे हैं जबकि तुलसी ने कहा है -भूत पिशाच निकट नहीं आवा, महावीर जब नाम सुनावा। मैंने गर्भगृह की ओर नजर घुमाई, देखा मुख्य पुजारी मुझे घूर रहा है। उसकी भंगिमा भौंडी हो गयी थी। हनुमानजी तक अपन कष्ट निवारण की प्रार्थना पहुँचाने का उत्साह मरता-सा लगा। कहीं सिविल लाइन वाले हनुमानजी ऐसी ही मुख-मुद्रा बनाकर मुझे न घूर उठें। चलें, बाहर चलें।
मैं बाहर आ गया। सोचा, सिविल लाइन वाले हनुमान मेरी पीड़ा नहीं हरेंगे। मैं तो मंगल को मरघटिया महावीर के पास ही जाऊंगा। उनसे विनती करूंगा -हे पवनपुत्र, इस रावण राज्य को अब आग लगा दो, यह राम का ही काज है। लंका धू-धू कर जले, मेरे उसके, सबके असह्य कष्ट उसमें जल जायेंगे। जल्दी करो, महावीर।
मैं घर आ गया। पत्नी के हाथों पर एक सौ एक रुपये रखे तो वह मुँह देखने लगी। मैंने कहा -‘मुँह क्या देख रही हो। अगले मंगल को मरघटिया हनुमान के दर्शन करने जाऊंगा। अब सिविल लाइन नहीं जाऊंगा।‘ सीता मेरा मुँह देखे जा रही थी।

"श्री हरिकृष्ण तैलंग स्मृति सम्मान"


कृपया पधारिये .."श्री हरिकृष्ण तैलंग स्मृति सम्मान"

29 दिसंबर 2014, सोमवार, शाम 4 बजे 
"मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन सभागृह 
(पी.एंड टी. चैराहा, शास्त्री नगर), भोपाल 
में दिवंगत साहित्यकार की स्मृति में स्थापित 
प्रथम "श्री हरिकृष्ण तैलंग स्मृति सम्मान" 
कानपुर के मूर्धन्य बाल साहित्यकार डाॅ. राष्ट्रबंधु 
और भोपाल के युवा व्यंग्यकार श्री शान्तिलाल जैन 
को  प्रदान किया जाएगा.

"शिकारी और भोले कबूतर"


लघुकथा/ हरिकृष्ण तैलंग 
 "शिकारी और भोले कबूतर"

(यह लघुकथा "सारिका" के बहुचर्चित आपातकाल अंक में छपी थी )

शिकारी ने जाल फैलाया। चार कबूतर उसमें आ फँसे। ओट में छिपा शिकारी खुश होता हुआ उनके पास आया। उसने कबूतरों की गर्दन मरोड़ने के लिए हाथ फैलाया ही था कि कबूतरों ने गिड़गिड़ाकर प्रार्थना की, ‘महाशय, हम गरीब और निरीह पक्षी हैं। हमारे छोटे-छोटे बच्चे हैं। यदि आप हमें मार डालेंगे तो नन्हे-नन्हे बेपर के बच्चे बेसहारा हो जायेंगे। उनका पालन-पोषण फिर कौन करेगा ? मेहरबानी करके हमें छोड़ दें। आपको अपने बाल-बच्चों की कसम है।’
शिकारी का दिल यह रूदन सुनकर भर आया। पर दूसरे ही क्षण उसकी जीभ पर कबूतरों के स्वादिष्ट माँस का जायका तैर आया। तब भी वह बाल-बच्चों की कसम उतारना चाहता था। एक क्षण सोचकर उसने कबूतरों से कहा, ‘मुझे तुम लोगों पर दया आ गई है। अब मैं तुम लोगों को नहीं मारूँगा। तुम लोगों को उड़ जाने की अब पूरी आजादी है।’
कबूतर बड़े खुश हुए। सच्चे दिल से उन्होंने शिकारी को दुआएँ दीं। फिर उड़ जाने की कोशिश करने लगे। पर जाल में पैर फँसे होने के कारण बेचारे फड़फड़ा कर रह जाते। जी-तोड़ मेहनत और भूख-प्यास ने उनका शरीर तोड़ डाला। कुछ घंटों बाद वे स्वयं मर गये।
शाम को शिकारी फिर आया। कबूतर उठाये और खुश होता हुआ घर लौट गया।
शिकारी जाल अब भी फैलाता है, पर जाल में फँसे हुए भोले कबूतरों को उड़ जाने की आजादी देकर वह दयावान कहलाना सीख गया है।